Published By:धर्म पुराण डेस्क

अजगर करे न चाकरी ... जानिए क्यों इस कहावत में समाया है जीवन-दर्शन

आधुनिक सभ्यता में सराबोर पुरुष और स्त्री कोई काम करना नहीं चाहते, जबकि पक्का इरादा, दूर दृष्टि, कड़ी मेहनत के अलावा सफलता का कोई और रास्ता नहीं है। 

यदि मेहनत व कर्म से बचने का आलस्य मन में आया कि नाव डूबी और नाव भी लकड़ी की नहीं, जिंदगी की है, फिर भी आलसीपन, कामचोरी, निकम्मापन, जिम्मेदारियों से बचने का भाव और मसलों-समस्याओं के सामने से कन्नी काट जाने का तौर-तरीका हमारा चरित्र हो गया है। हम फालतू गपशप में उपयोगी और कीमती समय खराब कर देते हैं और इसके लिए कभी न सोचते हैं, न पछताते हैं।

आपने सुना होगा कि- अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम; दास मलूका कहि गये, सबके दाता राम !

इसका मतलब यह है कि अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और न पंछी कोई काम करता है। संत मलूकदास कहते हैं कि सबको भगवान भोजन देते हैं। इस प्रश्न में जीवन-दर्शन समाया हुआ है। मानव जीवन और राष्ट्र के प्रति भी गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है।

पहली बात तो यह है कि चाकरी का मतलब है, पैसे के बदले दूसरे के लिए मेहनत करना, फिर उस पैसे से अपने भोजन आदि का प्रबंध करना। अजगर अपने भोजन के लिए कितना परिश्रम करता है, इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने महीनों-बरसों जंगलों की धूल छानकर अजगरों के जीवन का अध्ययन किया है।

घण्टों और कभी-कभी कई दिनों तक भूख की प्रतीक्षा करने के बाद जब कोई खरगोश, लोमड़ी या हिरन का बच्चा उसे दिखाई देता है, तो वह पूरी सावधानी और ताकत से अपने शरीर का अगला और भारी भाग उस पर फेंक कर उसकी गति में अवरोध पैदा करता है और इससे पहले कि वह उसके बोझ से निकलने की कोशिश करे, उड़नछू हो जाए, अजगर उसे अपनी कुण्डली में जकड़ लेता है। अजगर की कुण्डली इतनी मजबूत होती है कि यदि उसमें शेर भी फँस जाए, तो नहीं निकल सकता।

जब अजगर अपनी जकड़न के दबाव से जान लेता है कि जानवर अब जानवर नहीं रहा बल्कि माँस का एक बड़ा लोथड़ा बन गया है, तो उसे एक तरफ से अपने मुँह में ले लेता है, पर दाँत न होने से चबा तो वह सकता ही नहीं, उसे सटकने लगता है, अर्थात् पूरे जानवर को धीरे- धीरे एक ग्रास की तरह गले से नीचे उतारने लगता है। 

देखने वाले कहते हैं, इस काम में उसे कभी-कभी कई दिन लग जाते हैं। अजगर के गले की ढील जरा-सा खिंचाव ले ले, तो जानवर की लाश का कोई भी उभरा हुआ अंश गले में फंस जाता है, तो खुद अजगर की ही जान गले में आ जाती है।

अजगर को अपने भोजन के लिए किसी की भी चाकरी करने वाले से अधिक श्रम करना पड़ता है। और पंछी? वह तो अजगर से भी अधिक दौड़-धूप, परिश्रम करने को विवश है; क्योंकि अजगर का भोजन उसे एक जगह, एक जानवर के रूप में मिल जाता है, पर पंछी का भोजन तो दाने-दाने और कण-कण के रूप में एक बड़े और अनजाने क्षेत्र में बिखरा रहता है। 

अगर आपकी नाली में पंछी को एक दाना भी दिखाई दे जाता है तो उसे भी उठाकर खुशी-खुशी खा जाता है। दर-दर ठोकरें खाकर शाम तक इसी तरह दाने-दाने की तलाश करता है, वह भी अपने बच्चों के लिए। मादा पक्षी अपने घोंसले में तो सिर्फ रात बिताने पहुँचती है। 

आधा-अधूरा भोजन के कारण थकी भूखे पेट प्रातः सूर्योदय का इन्तजार करती है। अब कहने वाला मलूकदास हो या दास मलूका उसने तो कह दिया कि अजगर चाकरी नहीं करता और पंछी काम नहीं करता, पर किसी सरकारी दफ्तर में काम करने वाले लोग कह सकते हैं कि उसे अपने भोजन के लिए अजगर और पंछी से अधिक श्रम करना पड़ता है।

आपने कभी अंतरात्मा से चिंतन किया है कि एक नन्ही सी चिड़िया और वजनी, भारी अजगर को अपना पेट भरने के लिए कितनी गहरी नाकाबंदी या भागम-भाग करनी पड़ती है। 

प्रकृति का नियम कर्म है, निरंतर श्रम और लगातार कड़ी मेहनत के बिना किसी को भोजन तो क्या, कुछ भी नहीं मिल सकता, तब हमारे देश में जीवन को बर्बाद करने वाली बातें जनमानस एवं घर-घर में क्यों फैली हुई हैं, जो हैं तो एकदम निकम्मी, पर उन्हें दोहराते इस तरह हैं कि जैसे हम किसी आध्यात्मिक रहस्य का उद्घोष कर रहे हों। इसलिए चैतन्य हो जाओ - श्रम- मेहनत करके ही हम अपना जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण कर सकते हैं।

डॉ. एम. एम. श्रीवास्तव


 

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