Published By:धर्म पुराण डेस्क

आप शिव के उपासक हैं या शंकर के…

चौंक गए ना ये सवाल सुनकर…नोट:-यदि लेख पूरा पढ़ सकते हैं तभी आगे बढ़े अन्यथा यह लेख आपके लिए नहीं हैवैसे भी कौन मानेगा कि शिव और शंकर अलग अलग है. हमें तो...

आप शिव के उपासक हैं या शंकर के ? चौंक गए ना ये सवाल सुनकर… वैसे भी कौन मानेगा कि शिव और शंकर अलग अलग है. हमें तो बचपन से यही बताया गया है ना कि शिव-शंकर एक ही है. यहाँ तक की दोनों नाम हम अक्सर साथ में ही लेते है. 

अगर हम आपको ये कहे कि शिव और शंकर ना सिर्फ अलग अलग है बल्कि शंकर की उत्पत्ति भी शिव से ही हुई है. शिव ही प्रारंभ है और शिव ही अंत है. शिव और शंकर में सबसे बड़ा और समझने में आसान अंतर दोनों की प्रतिमा में है. 

शंकर की प्रतिमा जहाँ पूर्ण आकार में होती है वही शिव की प्रतिमा लिंगम रूप में होती है या अंडाकार अथवा अंगूठे के आकार की होती है. इसी अंडे को हिरण्यगर्भ कहा जाता है यानी शिव ही हिरण्यगर्भ हैं| 

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत । 

स दाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवायहविषा विधेम ॥ 

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः । 

यस्य छायामृतं यस्य मर्त्युः कस्मै देवायहविषा विधेम ॥

यह ऋग्वेद का सूत्र है । हमारी इस धरती रूपी ‘सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।’ ‘शिव वह है जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण शिव है।’ यह ऊपरी सूत्र का अर्थ है । 

प्रारंभ में ईश्वर (ब्रह्म) ने सर्जक के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त किया- ‘हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसित।।’ अर्थात हिरण्यगर्भ यानी सुनहरा गर्भ, जिसके अंदर धरती, सूरज, चांद-सितारे, आकाशगंगाएं, ब्रह्मांडों के गोलक समाए थे और जिसे बाहर से 10 तरह के गुणों ने घेर रखा था, एक दिन वायु ने इसे तोड़ दिया। 

हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋग्वेद 10.121), वायुपुराण। वेद हिरण्यगर्भ रूप को पृथ्वी और द्युलोक का आधार स्वीकार करते हैं- यह हिरण्यगर्भ रूप ही ‘आप:’ के मध्य से जन्म लेता है। हिरण्यगर्भ से ही ‘हिरण्य पुरुष’ का जन्म हुआ। 

ब्रह्मांड का मूल क्रम- अनंत से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। अनंत जिसे आत्मा कहते और जिसे ब्रह्म,शिव, परम शिव भी कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि (महत्) और अहंकार ये प्रकृति के 8 तत्व हैं। 

यह ब्रह्मांड अंडाकार है। यह ब्रह्मांड जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। इससे जल से भी 10 गुना ज्यादा यह अग्नि तत्व से घिरा हुआ है और इससे भी 10 गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना गया है। 

वायु से 10 गुना ज्यादा यह आकाश से घिरा हुआ है और यह आकाश जहां तक प्रकाशित होता है, वहां से यह 10 गुना ज्यादा तामस अंधकार से घिरा हुआ है और यह तामस अंधकार भी अपने से 10 गुना ज्यादा महत् से घिरा हुआ है और महत् उस एक असीमित, अपरिमेय और अनंत से घिरा है। उस अनंत से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है और उसी से उसका पालन होता है और अंततः यह ब्रह्मांड उस अनंत में ही लीन हो जाता है। 

प्रकृति का ब्रह्म में लय (लीन) हो जाना ही प्रलय है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही प्रकृति कही गई है। इसे ही शक्ति कहते हैं।  

महादेव शंकर : शंकर भी ब्रह्मा और विष्णु के तरह देव है और सूक्ष्म शरीरधारी है. ब्रम्हा और विष्णु की तरह शंकर भी सूक्ष्म लोक में रहते है. शंकर भी विष्णु और ब्रम्हा की तरह ही परमात्मा शिव की ही रचना है. शंकर को महादेव भी कहा जाता है परन्तु शंकर को परमात्मा नहीं कहा जाता क्योंकि शंकर का कार्य केवल संहार है. पालन एवं निर्माण शंकर का कर्तव्य नहीं है.

शिव : शंकर से अलग शिव परमात्मा है. शिव का कोई शरीर नहीं कोई रूप नहीं है. शिव, शंकर, ब्रह्मा और विष्णु की तरह सूक्ष्म लोक में नहीं रहते. उनका निवास तो सूक्ष्म लोक से परे है. 

शिव ही ब्रह्मा, विष्णु, शंकर त्रिदेवों के रचयिता है. शिव ही विश्व का निर्माण, कल्याण और विनाश करते है जिसका माध्यम ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते है. सबका जन्म दिन होता है क्या आपने कभी सोचा है कि शिव ही एकमात्र ऐसे है जिनके जन्मदिन को शिवरात्रि कहा जाता है. 

इसका भी एक कारण है रात्रि का मतलब शाब्दिक नहीं है यहाँ रात्रि का अर्थ कुछ और है. यहाँ रात्रि से अभिप्राय ये है कि पाप, अन्याय, बुराइयाँ. जब काल के साथ साथ मनुष्य नीचता की और बढ़ता चला गया उस समय की तुलना रात्रि से की गयी है और उस गहरी रात्रि को शिव प्रकट होते है अर्थात जन्म लेते है. 

शिव के जन्म की रात्रि के बाद रात्रि अर्थात अंधकार का अंत हो जाता है और मनुष्यता एक बार फिर उन्नत हो जाती है. ये था शिव और शंकर में अंतर और शिव जन्म को शिव रात्रि कहने का भेद. स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। 

वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्मांड (ब्रह्मांड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्ध काल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है। 

शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विलय के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।  


 

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