Published By:धर्म पुराण डेस्क

भगवान से बातचीत करने का समय व्यर्थ बर्बाद न करें

क्या मनुष्य ईश्वर से बातचीत कर सकता है ? क्या परमपिता तक हमें अपना संदेश मन की व्यथा, प्रार्थना या विनय पहुंचाने का कोई विशेष समय नियत है? क्या दुनियावालों की फरियाद सुनने का कोई खास वक्त है ?

— ये प्रश्न आपके मन में उठते रहते हैं-

आप किसी बड़े अफसर या उच्च अधिकारी से मिलने जाते हैं तो पहले यह मालूम करते हैं कि उनके मिलने या बाहर वालों से बातचीत करने का क्या समय है ? उनको खाली समय कब मिलता है? वे आपकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुनने के लिये कितना और कब समय दे सकते हैं?

जब आपको वे उच्च अधिकारी निश्चित समय दे देते हैं, तब आप उनसे मुलाकात करने जाते हैं। आपको सदा यह डर रहता है कि कहीं समय से पहले या पीछे न पहुंचे। कहीं ऐसा न हो कि हमारी इंटरव्यू के समय ही निकल जाए। 

किसी अन्य व्यक्ति को हमारे बाँटे का समय दे दिया जाय अथवा एक बार ठीक समय पर न जाने से अफसर महोदय रुष्ट होकर फिर कभी मिलने का समय ही न दें।

अतः आप मिलने के लिये दो-चार मिनट पहले ही गंतव्य स्थान पर पहुँच जाते हैं। सदा समय की पाबंदी का ध्यान रखते हैं और जब आपका निर्धारित समय आता है, तब उनसे मिलकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहते हैं।

अधिकारी महोदय से आप अपने मन की सब बातें जल्दी-जल्दी कहते जाते हैं। कोई भी गुप्त बात नहीं छिपाना चाहते। कम-से-कम चुने हुए शब्दों में अपनी समस्याएँ समझाकर मन को हल्का कर लेना चाहते हैं। आपकी हार्दिक इच्छा यही रहती है कि अपने समय का पूरा-पूरा लाभ उठावें। कुछ भी बात अवशेष रह न जाए।

यही तथ्य ईश्वर से मिलने और बातें करने के समय के विषय में भी सत्य है। भगवान के पास अपनी फरियाद, समस्याएं और विनती सुनाने वाले व्यक्ति हजारों हैं, प्रतिक्षण भरा हुआ है। किंतु उनकी असीम करुणा देखिये, वे सबकी बातें सुनते हैं, सबको वक्त देते हैं। 

किसी को कभी निराश नहीं करते; किसी से भी उनका पक्षपात नहीं है। हम भी उनसे सीधा सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं और अपनी करुण वेदना तथा हार्दिक प्रार्थना उन तक पहुँचा सकते हैं। यों तो ईश्वर से किसी भी समय सम्पर्क किया जा सकता है; क्योंकि वे सदा-सर्वत्र है और उनसे हमारा नित्य-निरन्तर सम्बन्ध है, तथापि उनके मिलने और बातें करने का एक बड़ा सुन्दर समय नियत है। बस, उस समय हम उनसे मिलकर अपनी व्यथा कह सकते हैं। वह समय हमारे लिये है।

रामचंद्र महेंद्र जीवन में नया प्रकाश में कहते हैं हमेशा आत्मा परमात्मा का ही एक अंश है। जब वह परम शुद्ध और सांसारिकता से ऊँचा उठता जाता है, तब उसका सीधा सम्बन्ध ईश्वर से हो जाता है। 

सृष्टि में अलक्षित ईश्वर-तत्त्व (ईथर) भरा हुआ है। इसी तत्त्व के माध्यम (medium) से हमारे दृढ़ विचारों की सूक्ष्म तरंगे दूर-दूर तक फैली हैं और बेतार के तार की तरह करोड़ों मील दूर तक हमारा संदेश पहुंचाते हैं। 

हम जितने आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प से अपने विचार ईश्वर तत्व में फेंकते हैं, वे उतनी जल्दी सीधे ईश्वर तक पहुँचते हैं और हमारा आत्मा उनका उत्तर भी सुनता है।


 

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