Published By:धर्म पुराण डेस्क

जप के लिए आवश्यक विधान

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने के अतिरिक्त प्रतिदिन की साधना के लिए कुछ बातें नीचे दी जा रही हैं : (1) समय (2) स्थान (3) दिशा (4) आसन (5) माला (6)नामोच्चारण (7) प्राणायाम (8) जप (9) ध्यान।

(1) समय: सबसे उत्तम समय प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त और तीनों समय (सुबह सूर्योदय के समय, दोपहर 12 बजे के आसपास व सायं सूर्यास्त के समय) का संध्याकाल है। प्रतिदिन निश्चित समय पर जप करने से बहुत लाभ होता है।

(2) स्थान : प्रतिदिन एक ही स्थान पर बैठना बहुत लाभदायक है। अतः अपना साधना-कक्ष अलग रखो। यदि स्थानाभाव के कारण अलग कक्ष न रख सकते हो तो घर का एक कोना ही साधना के लिए रखना चाहिए। उस स्थान पर संसार का कोई भी कार्य या वार्तालाप न करो। उस कक्ष या कोने को धूप-अगरबत्ती से सुगंधित रखो। 

इष्ट अथवा गुरुदेव की छवि पर सुगंधित पुष्प आदि चढ़ाओ और दीपक करो। एक ही छवि पर ध्यान केन्द्रित करो। जब आप ऐसे कक्ष अथवा स्थान पर बैठकर गुरुप्रदत्त मंत्र या इष्टमंत्र का जप करोगे तो उससे जो शक्तिशाली स्पन्दन उठेंगे, वे उस वातावरण में ओतप्रोत हो जायेंगे।

(3) दिशा : जप पर दिशा का भी प्रभाव पड़ता है। जप करते समय आपका मुख उत्तर अथवा पूर्व की ओर हो तो इससे जपयोग में आशातीत सहायता मिलती है।

(4) आसन : आसन के लिए मृगचर्म, कुशासन अथवा कम्बल के आसन का प्रयोग करना चाहिए। इससे शरीर की विद्युत-शक्ति सुरक्षित रहती है।

साधक स्वयं पद्मासन, सुखासन अथवा स्वस्तिकासन पर बैठकर जप करे वही आसन अपने लिए चुनो जिसमें काफी देर तक कष्ट रहित होकर बैठ सको। स्थिरसुखमासनम् । शरीर को किसी भी सरल अवस्था में सुखपूर्वक स्थिर रखने को आसन कहते हैं।

एक ही आसन में स्थिर बैठे रहने की समयावधि को अभ्यासपूर्वक बढ़ाते जाओ। इस बात का ध्यान रखो कि आपका सिर, ग्रीवा तथा कमर एक सीध में रहें झुककर न बैठो। एक ही आसन में देर तक स्थिर होकर बैठने से बहुत लाभ होता है।
 

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