Published By:धर्म पुराण डेस्क

हिंदू संस्कृति और कालज्ञान..

काल: स्वभावो नियतिर्यदच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या ।

संस्कृति के मूल कारणों का निर्देश करते हुए श्रुति ने काल को सबसे पहले लिया है। वस्तुतः बुद्धि काल की ही एक कला है, अतएव वह काल की सीमा में बहुत ही सीमित होकर चिन्तन करती है। कालातीत का चिंतन या कल्पना करना बुद्धि की सीमा के परे की वस्तु है। 

काल के उत्पादक हैं महाकाल शिव। अतएव काल ज्ञान अथवा काल-विद्या के आदि गुरु भी महाकाल शिव ही हैं। महाकाल से अनादि अनन्त स्वरूप काल अभिव्यक्त होकर अपनी कला से अनन्त प्रकृति-वैचित्र्य का उत्पादन होता है।

हम जिस जगह में रहते हैं, उसका नियामक काल सूर्य रूप से अपनी कला का विस्तार करता है। ग्रह उपग्रहों की सृष्टि करके उनमें नाना प्रकार के प्राण धारियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की लीला-रचना में रत हुआ वह अतिशय प्रकाशमान हो रहा है। प्रजा को उत्पन्न कर उसके कर्मों का वही द्रष्टा है और वही उन कर्मों के परिपाक का होता है।

काल की कृति को देखकर सभी हैरान हैं। अच्छे बुरे जीवन का निर्माण करता हुआ काल-ही-काल लीला कर रहा है। काल ही मृत्यु है, यम है; वही ब्रह्मा है, विष्णु है और महेश्वर है। वही लोक है, परलोक है, सत्य है, असत्य है, शून्य है, अशून्य है, सब कुछ है। 

सत् और असत् कालरूप पक्षीके दो डैने हैं, वह अनन्त शून्य रूप हो रहा है। जो साधक उस शून्य में विलीन होने की चेष्टा करते हैं, उन्हें निर्वाण प्राप्त होता है, वे परम शान्ति के साम्राज्य में प्रवेश करते हैं। काल की महिमा अनंत है, अगम-अगोचर है- उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

काल को दैव भी कहते हैं। लोक में काल के लक्षणों के ज्ञाता दैवज्ञ कहलाते हैं। क्योंकि काल का विधायक सूर्य ज्योतिर्मय है, अतएव काल विद्या को ज्योतिर्विज्ञान या ज्योतिः शास्त्र भी कहते हैं और इसके ज्ञाता ज्योतिषी या ज्योतिषी कहलाते हैं। ज्योतिर्विज्ञान में ज्योतिर्मय लोकों के प्रकाश से अंधकारमय आकाश में होने वाले कर्मों के स्वरूप और उनके फलाफल का विवेचन होता है। इस प्रकार काल विज्ञान का क्षेत्र अन्य विज्ञानों की अपेक्षा बहुत ही श्रेष्ठ है और यह मानवी दृष्टि को दैवी दृष्टि में परिणत कर मनुष्य को भौतिक कार्य-कलाप में प्रेरणा प्रदान करने वाली दिव्य ज्योतिर्मय शक्तियों की गतिविधि की आलोचना करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

अन्य विविध विज्ञान बुद्धि के विलास मात्र हैं। बुद्धि काल की कला होने के कारण कालगत पूर्वापर सम्बन्ध पर ही अवलम्बित होकर कार्य करती है। कालगत पूर्वापर सम्बन्ध ही कार्य-कारण की भावना का उत्पादक या स्वरूप है। और यही समस्त विज्ञान और दर्शन का हेतु है। यही क्यों, सारी विद्याएं, सारी गवेषणा और सब प्रकार की खोज में कार्य-कारण-सम्बन्ध ही प्रबल और प्रथम हेतु होता है। 

बुद्धि-वृत्ति भी कार्य-कारणमय ही होती है, अतएव काल की एक कला में ही सारी ज्ञान-लीलाएं होती रहती हैं। इसलिये काल विज्ञान यदि मनुष्य की राष्ट्र अथवा विश्व की विद्या-बुद्धि, धर्म अधर्म, उत्थान-पतन, सुख-दुख आदि का निर्देश ज्योतिर्लोक-ग्रह- उपग्रहादि के प्रकाश के अनुसार करता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। 

सच्चा दैवज्ञ इस जगत के क्रियाकलापों को नियंत्रित अथवा प्रेरित करने वाले ग्रहों की स्थिति, गति, दृष्टि और सम्बन्ध के आधार पर भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं को हस्तामलकवत् देख सकता है। परंतु काल का द्रष्टा होने के लिये कालातीत स्थिति में रहना अर्थात आत्मस्थ होना परम आवश्यक है। प्रपंच में निरंतर रत रहने वाला पुरुष दैवज्ञ कहलाये, यह भी एक विडम्बना है। 

ज्योतिर्विद के लिये अध्यात्म साधना करना परम आवश्यक है; जो दैवज्ञ इस मार्ग में जितना ही अधिक अग्रसर होगा, काल की कथाओं की लीला, ज्योतिर्लोक के विभिन्न प्रकाश, और उनका पारस्परिक मिश्रण तथा प्रभाव प्रपंच उतना ही अधिक स्पष्ट रूप से उसके सामने दिखने लगेंगे। 

साधन विहीन केवल कपट-कलेवर धारण किया हुआ पुरुष साधु नहीं कहला सकता, उसी प्रकार दैवज्ञ का बाना धारण कर प्रपंच के अंधकार में भटकने वाले पुरुष को ज्योतिर्लोक का दर्शन नहीं हो सकता। साथ ही ऐसे लोगों को देखकर साधुत्व या कालज्ञान की सत्यता के विषय में संदेह करना भी बुद्धिमानी नहीं है।

ज्योतिर्विज्ञान महामाया की लीला के आधारभूत संकेतों का अध्ययन करता है। काल अपने साथ अनादि और अनंत की प्रत्यक्ष भावना लेकर महाकाल शंकर की ओर संकेत करता है। काल कराल रूप धारण कर मृत्यु के रूप में प्रकट होता है; काल को भी ग्रास करने वाला महाकाल है, अतएव वह महामृत्यु भी कहलाता है। वह भगवत्-स्वरूप ही है। 

कालाधीन होना बंधन है, दुःख का मूल है। महाकालाधीन होना मुक्ति है, अमरत्व है; अतएव ज्योतिर्विज्ञान मर्त्य जीवन के मूलभूत सिद्धांतों का ही अध्ययन करता है, अमरत्व के सिद्धान्तों का नहीं। इसका समावेश अपरा विद्या में होता है, परा में नहीं।

भारतीय चिंतन का प्रवाह मुख्यतः दो ही धाराओं में विभक्त होता है- परा विद्या की धारा और अपरा विद्या की धारा परा विद्या का विषय है अक्षर ब्रह्म और अपरा विद्या का क्षर ब्रह्म अर्थात नाशवान् जगत्। श्रुति में इन दोनों विद्याओं की राशि संचित है और वैदिक संस्कृति में इन दोनों को समन्वित कर जगत् जीवन को सौम्य बनाने की चेष्टा की गयी है। ज्योतिर्विज्ञान अपरा विद्या का एक अंश है।

काल की शक्ति है कालिका । कालिका-ज्ञान विषय है तंत्र विद्या का। अतएव काल विज्ञान का तंत्र विद्या के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। शक्ति का एक उपासक अपनी इस स्तुति में इस रहस्य का उद्घाटन करता है| 

दधानो भास्वत्ताममृत निलयो लोहित वपु, विनम्राणां सौम्यो गुरुरपि कवित्वं च कलयन्। 

गतौ मन्दो गङ्गाधर महिषी कामाक्षि भजतां तमः केतुर्मातस्तव चरणपद्मो विजयते ॥

'हे शंकर वल्लभे! कामाक्षी! तुम्हारे चरण कमल विजय को प्राप्त हो रहे हैं। भास्वता (भास्वान् सूर्य) को धारण कर ये अमृत के निलय (चन्द्र), लाहित रूप (मंगल), उपासकों के लिये सौम्य (बुध), स्वरूप), गुरु (बृहस्पति) अर्थात गौरव-युक्त होने पर भी कवि (शुक्र), की कल्पना करते हुए, मन्द (शनि) गति से युक्त तथा भजन करने वालों के तम (राहु) अर्थात मोहान्धकार को नाश करने वाले (केतु) हैं।'

वस्तुतः शक्ति के बिना रवि-चन्द्र आदि ग्रह-उपग्रहों का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। अतएव शक्ति का उपासक इनको शक्ति का अंगभूत ही देखता और जानता है। ज्योतिर्विज्ञान का विद्यार्थी यदि शक्ति का उपासक और तांत्रिक है तो वह इसके फलाफल के ज्ञान का अधिकारी हो सकता है। 

तांत्रिक साधना में परा और अपरा के एकीकरण की चेष्टा की जाती है, इसलिए साधक को काला अधीन रहते हुए भी कालातीत होना पड़ता है। अतएव तान्त्रिक को ज्योतिर्लोकों का दर्शन दिव्य दृष्टि से होता है, वह दिव्यता साधना के बल से अथवा शक्ति की कृपा से इन चर्म चक्षुओं में ही प्राप्त होती । भारतीय ज्योतिर्विज्ञान का आधार दूरबीन नहीं, दिव्यचक्षु है।

योगदर्शन में आता है— 'भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्', ‘चन्द्रे ताराव्यूहजानम्', 'ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ।' अर्थात् सूर्य में संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) का अभ्यासी दिव्य-दृष्टि से चतुर्दश भुवनों को देखता है, चन्द्र में संयम करने से तारा-व्यूह का ज्ञान होता है, ध्रुव में संयम करने से ताराओं की गति का ज्ञान होता है। 

महर्षि पतञ्जलि ने इस प्रकार योगसाधन के द्वारा दिव्य-दृष्टि प्राप्त कर ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन का जो मार्ग प्रशस्त किया है, उसके द्वारा प्राप्त ज्ञान निर्भ्रांत ज्ञान है। वह प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर प्राप्त होता है और वह प्रत्यक्ष भी यौगिक प्रत्यक्ष है। लौकिक प्रत्यक्ष में भ्रान्ति हो सकती है, परंतु यौगिक प्रत्यक्ष तत्त्वदर्शी होने के कारण सदा भ्रान्ति शून्य होता है। 

आधुनिक दूरवीक्षण यन्त्रों के द्वारा प्राप्त ज्ञान लौकिक प्रत्यक्ष और अनुमान के आधार पर होने के कारण अनाप्त (Hypothetical) होता है। अतएव इसमें भ्रान्ति होती है और अगले अन्वेषण अपने पूर्व के अन्वेषणों के लिये बाधक होते जाते हैं। इस प्रकार के संशयग्रस्त और अनिश्चित ज्ञान योगज दृष्टि के द्वारा प्राप्त आर्ष ज्ञान के सम्मुख प्रमाणकोटि में नहीं रखे जा सकते। 

अतएव भारतीय ज्योतिर्विज्ञानकी महिमा निर्विवाद सिद्ध होती है। यौगिक संयम से केवल आकाशीय ग्रहों का (Astronomical) ज्ञान ही नहीं होता, बल्कि तद्द्वारा होने वाले जीवन-जगत के शुभाशुभ कर्मफलों का (Astrological) ज्ञान भी होता है। प्रवृत्ति लोक न्यायात् सूक्ष्म अव्यवहित विप्रकृष्ट ज्ञानम् ।

ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक में संयम करने से योगी को सूक्ष्म, व्यवहित और दूर की वस्तुओं का ज्ञान होता है। अर्थात योगी की दृष्टि को देश और काल का व्यवधान बाधक नहीं हो सकता। उसे हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष त्रिकाल ज्ञान होता है। 

यही नहीं, काल का एक क्षुद्र अंश है क्षण | क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेक जन्य ज्ञान होता है, अर्थात सत्-असत् आदि का योगी प्रत्यक्ष द्रष्टा हो जाता है। काल की यह भी एक महिमा है। अतएव काल-ज्ञान लोक और परलोक दोनों को प्रत्यक्ष कराने वाला होता है।

काल के क्षणों का पूर्वा पर- क्रम जिस प्रकार कार्य कारण की भावना का हेतु होता है, उसी प्रकार इन क्षणों की स्थिति संख्या की भावना को उत्पन्न करती है। काल विज्ञान के साथ गणना का अटूट सम्बन्ध इसी कारण से है। शून्य अर्थात् आकाश में काल की क्रीड़ा होती है, इस कारण रेखागणित या तत्प्रधान अन्य गणनाओं में आकाश की प्रमुखता तथा अंकगणित या तत्प्रधान अन्य गणनाओं में काल की प्रमुखता होती है। 

अतएव आकाशीय ज्योतिर्लोकों की गति, स्थिति और उसके लौकिक फलाफल के निर्णय में गणित-शास्त्र का अटूट सम्बन्ध रहता है। आधुनिक आधिभौतिक विज्ञानों के मूल में इस गणित-विज्ञान ने प्रयोगात्मक सहायता प्रदान की है, अतएव इस विज्ञान विस्तार में मूलत: काल की ही लीला दृष्टिगोचर होती है।

काल की महिमा अपार है। परंतु काल निरन्तर परिवर्तनशील है। काल के प्रतीक ज्योतिर्लोक भी क्षण क्षण परिवर्तन के शिकार हो रहे हैं। आकाशीय ज्योतिर्लोक ग्रह, उपग्रह, तारक लोकों की स्थिति बदलती रहती है। पहले की अपेक्षा आज इनमें बहुत परिवर्तन हो गया होगा। योग और तंत्र के द्वारा प्राप्त दृष्टि का आज अभाव है, अतएव काल-ज्ञान और उसका फलाफल-निर्णय आज कुछ संदिग्ध-सा हो रहा है। 

अविद्या अर्थात् योगमाया के इस महा-अंधकारमय आकाश में दिव्य दृष्टि से देखने का आनंद लूटने और त्रिकालज्ञ होने का सौभाग्य हमें कब प्राप्त होगा? ऋषियों के द्वारा प्रदान किया हुआ निर्भ्रान्त ज्ञानलोक भी दिव्य-दृष्टि विहीन हमारे नेत्रों के सामने धुंधला-सा दिख पड़ता है। 

स्वतंत्र भारत के महत्वाकांक्षी युवक ऋषि-प्रदर्शित इस मार्ग की ओर अग्रसर होकर इस सर्वश्रेष्ठ विज्ञान - ज्योतिर्विज्ञान या काल-ज्ञान के अन्वेषण में अपने जीवन की आहुति देने के लिये तैयार हों तो विश्व मानव का परम कल्याण साधन कर सकेंगे। यह विषय बहुत गहन और दुर्बोध है; यदि अवकाश मिला तो इस विषय के आर्षज्ञान पर पुनः कुछ विवेचना करने की चेष्टा की जाएगी।

नाभिजात्यं न वै शीलं न बलं न च नैपुणम् । भवेत्कार्याय पर्याप्तं कालश्च ह्यनिरोधकः ॥

'कुलीनता, शील, बल, बुद्धिमानी- ये सब मनुष्य के कार्य-साधक के लिये समर्थ नहीं होते। काल कुछ-का कुछ कर डालता है, उसकी रेखा को कोई मिटा नहीं सकता।'

(लेखक - अलख निरंजन)

 

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