Published By:अतुल विनोद

ह्यूमैनिटी की सबसे बड़ी हेल्प... ऐसे सुधर जायेगा देश... दुष्कर्म से मिलेगी मुक्ति-.......अतुल विनोद

हमारी ज़रूरतों का पूरा न होना दुःख का बड़ा कारण है|क्योंकि डिमांड  क्रीयेट करना मानव का नेचर है| मांग की एक बार पूर्ति कर देने के बाद दूसरी मांग तैयार हो जाती है| आप खुदके साथ भी ऐसा करके देखें क्या एक मांग पूरी होने पर आप संतुष्ट हो जाते हैं? “नहीं” तो फिर हम खुद को और दूसरों को ऐसा क्या दे सकते हैं जो सबसे बेहतर हो?  स्वामी विवेकानंद कहते हैं सबसे बड़ी सहायता है आध्यात्मिक सहायता| स्पिरिचुअल नॉलेज से ही दुखों के ऊपर पंहुचा जा सकता है| पारमार्थिक ज्ञान देने वाला ही हमारा सबसे बड़ा हितैषी है| इसी आध्यात्मिक बल से तृप्ति आती है| सामान से मिलने वाली तृप्ति टेम्पररी है| स

बसे निचले स्तर पर है फिजिकल हेल्प, इसके उपर है बौद्धिक सहायता(ज्ञान दान) और सबसे उपर है अध्यात्मिक सहायता| जो हमे आत्म बल दे वो अध्यात्म ही है बौद्धिक ज्ञान से सांत्वना मिलती है लेकिन बल नहीं|  भौतिक सहायता से ज़रूरतें पूरी होती हैं लेकिन पूर्ण तृप्ति नहीं| अस्पताल, देवालय, सहायता केंद्र, योजनायें, दान, धर्मशालाएं, मुफ्त दवा, भोजन, सब्सिडी, ऋण सुविधा ज़रूरी है इसे करते रहना है| ये भी समाज सेवा हैं| लेकिन मनुष्य का कर्तव्य है कि वो अध्यात्म शक्ति सम्पन्न बने फिर लोगों को इस सबसे उच्च शक्ति से प्रेरित करे| हमारा छोटा से छोटा काम, कर्म एक इम्प्रेशन बनाते है| यही संस्कार कहलाता है| शरीर से निठल्ले बैठा नहीं जाता| कुछ तो करना है ऐसे में वो करें जो सर्वश्रेष्ठ हो|खुद का संस्कार एक व्यक्ति का चरित्र बनता है और सबके संस्कार मिलकर राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करते हैं|  आज समाज में रेप की घटनाएं बढ़ने का कारण हमारे सामूहिक चरित्र है| हमारा पूरा चरित्र अश्लीलता से भरा है| दिन रात टीवी, मोबाइल, सिस्टम और पेपर मैगज़ीन पर उभरने वाले मोडल्स और एक्टर्स के भड़काऊ चित्र युवाओं की भावनाओं को भडका रहे हैं|

आधुनिकता के चलते इसे रोकना सम्भव नही| भडक रही ऊर्जा को अध्यात्म के ज़रिये आत्मबल में ट्रांसफॉर्म किया जा सकता है| आत्मबल से सम्पन्न व्यक्ति शरीर के सुख के लिए जोर ज़बरदस्ती नहीं करेगा| ऐसा व्यक्ति गलत लोगों की संगती में भी गलत रास्ता नहीं पकड़ता| उसे अपनी सीमायें पता होती हैं| वो भोग करते हुए भी उसमे लिप्त नहीं होता|  दुनिया में अनेक महापुरुष हुए सबका मार्ग एक नहीं था लेकिन आखिर में वो एक ही मुकाम पर पंहुचे| विधियाँ अलग अलग हैं, लेकिन एक समय बाद व्यक्ति उन विधियों से परे एक ही आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त करता है|  कर्म और कार्य ऐसे हों कि वे अपने उपर कोई संस्कार न छोड़ पायें और छोड़ें तो पॉजिटिव  ही छोड़ें| प्रकृति के स्वामी बनकर काम करो| काम करते हुए भी उनका प्रभाव न पड़ने दो| कर्म की लहरों के साथ बहो मत यही तो धर्म शिक्षा है|  डॉक्टर दिन रात मरीजों के साथ रहता है दिन भर में कितने तरह के रोगियों के साथ रहता है लेकिन वो अपनी जिंदगी में सबसे कम बीमार होता है| कैसे? क्यूंकि वो रोग और रोगी का इलाज करते हुए भी खुदको उनसे दूर रखता है|

शरीर तो कांटेक्ट में है लेकिन मन से वो उनसे निर्लिप्त है| मन की शक्ति के कारण ही वो रोगों से मुक्त रहा पाता है वरना, हर दिन वो अनेक रोगों को लेकर घर पंहुचे| ऐसे ही अनेक कर्म करते हुए भी उन कर्मो के प्रभाव को मन पर न पड़ने दिया जाए तो वो शरीर पर भी इम्प्रेशन नही डाल पायेंगे| सही कर्म, सही धर्म, और अध्यात्म से ही कल्याण होगा। हर व्यक्ति इन तीनोंं रास्तों पर चल हुए खुद का कल्याण भी करें और दूसरों को भी मार्गदर्शन दें ।

धर्म जगत

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