Published By:धर्म पुराण डेस्क

भगवान विष्णु

श्रुति सार सर्वस्व वे आदिनारायण अपनी योगमाया | जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय के लिये ब्रह्मा, । विष्णु, महेश के त्रिविध रूपों में व्यक्त होते हैं। पर वैकुण्ठ में वही चिन्मय अष्टदल नित्य पद्मासन पर आसीन हैं। श्वेतद्वीप में वही 'शशिवर्णं चतुर्भुजम्' रूप से विराजमान हैं। क्षीरोदधि में वे ही अनंतशायी हैं और रमा वैकुण्ठ में भगवती लक्ष्मी के साथ उन्हीं का नित्य लीलाविलास चलता है।

वही प्रभु ब्रह्माण्डरूप विराट् पुरुष हैं और वही ब्रह्माण्डोदधिशायी नारायण हैं। सम्पूर्ण जल उन्हींसे प्रकट हुआ है। श्रुतियाँ उन्हीं के नि:श्वास से निसृत हैं। वे ही श्रुति के प्रतिपाद्य हैं। श्रुति उन्हीं की स्तुति करती है। वे ही यज्ञस्वरूपाय हैं। यज्ञ उन्हीं से व्यक्त हुए। वे स्वयं यज्ञ के होता, ऋत्विक्, यजमान, अग्नि और उपकरण हैं। यज्ञों द्वारा उन्हीं यज्ञ-पुरुष का वजन होता है। वही प्रभु जगत पालन के लिये 'सशंख-चक्र चतुर्भुज मेघश्याम' रूप से शेषशय्या पर विराजमान हैं। उन्हीं की नाभि से पद्म प्रकट हुआ। पद्मसम्भव ब्रह्माजी ने उसी पद्म में निखिल लोक-कल्पना की है।

मधु-कैटभ को मारकर ब्रह्मा तथा शक्तियों का उद्धार उन्हीं प्रभु ने किया है। वही नाना अवतार धारण करा धरा को भारमुक्त करते हैं। भगवान् शंकर को भस्मासुर से उन्होंने बचाया। त्रिपुरा रसकूप बनकर त्रिपुरारी को • विजयी किया और जालंधर संग्राम में भी शंकर की विजय उन्हीं के द्वारा हुई। समस्त धर्मों से उन्हीं की

आराधना होती है। अतः जालंधर पत्नी वृंदा का पातिव्रत्य उनकी ही तो अर्चा थी। उन्होंने वृन्दा को तुलसी बनाकर अपने वक्ष पर नित्य विलसित वर्णमाला में स्थान दिया, अपने चरणों की अधिकारिणी बनाया।

वही सच्चिदानंद प्रभु देवताओं के परमाश्रय हैं। उन्होंने ही समुद्र मंथन के समय वासुकी के मस्तक और पुच्छ को पकड़कर समुद्र मंथन किया। कौस्तुभ रत्न उन्हीं के कण्ठ को दूषित करता है। भगवती लक्ष्मी उनके वक्षमें वास करती हैं। वे ही श्रीवत्सलांछित प्रभु उन्मद असुरोंका दमन करते हैं और शरणागत का परित्राण करते हैं। त्रिदेवों में कौन श्रेष्ठ है- इसका निर्णय करने के लिये महर्षि भृगु ने उनके वक्ष में पाद प्रहार किया। उन नित्य आनंदघन में रोष-कषाय कहाँ ? विप्र का चरण प्रभुने करोंसे मर्दित करते हुए कहा- 'इस कोमल पद को कष्ट हुआ होगा।' उन शोभा सिन्धु के विशाल वक्ष पर विप्र का वह चरण-चिह्न - भृगु लता नित्य भूषण हो गयी।

वे त्रिगुणातीत प्रभु जगत्-रक्षा के लिये सत्त्व के अधिष्ठाता हैं। समस्त शास्त्र उन्हीं का गुणगान करते हैं। उनके नाम, गुण, चरित का वर्णन, कीर्तन भगवान् शेष सहस्र मुख से करते रहते हैं। अनन्त काल में भी समाप्त होने वाले वे गुण नहीं हैं। उन निखिल सद्गुणगणैकधाम, सर्वरूप, सर्वमय, सर्वातीत, सर्वपर, सर्वेश्वर, शोभाधाम, लक्ष्मीकान्त नारायण के पावन पादपद्मे में शतशः प्रणाम।

अनादिकाल से श्रुतियाँ उन प्रभु का गुणगान करती हैं। उनकी नैष्ठिक आराधना के सम्प्रदाय-परम्परा अनादि हैं। वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों ने न तो किया और न कुछ उसमें घटाया बढ़ाया। द्वापर के नूतन प्रतिष्ठित अंत में ये परम्परा क्षीण होने लगी थीं। 'न हि वैष्णवता कुत्र सम्प्रदाय पुरःसर।' आचार्यों ने लुप्त होती उन परंपराओं को पुनः प्रसारित मात्र किया है। स्मृतियाँ श्रुतियों की अनुगामिनी हैं। स्मार्त धर्म पंचदेवों में किसी एक को नैष्ठिक रूप से आराध्य बनाने का प्राणी को आदेश देता है। वैष्णव या भागवत धर्म श्रुति-स्मृति-पुराण प्रतिपादित अनादि धर्म है। हिंदू समाज में कला के क्षेत्र में वैष्णव-भावना के अपार वरदान हैं।

 

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