Published By:दिनेश मालवीय

सनातन धर्म के छह दर्शन -दिनेश मालवीय

भारत के ऋषियों ने जीवन के सम्पूर्ण चिन्तन के पश्चात यह निष्कर्ष दिया है , कि श्रृष्टि की रचना में छह कारण हैं- निमित्त कारण, उपादान कारण, काल, पुरुषार्थ, कर्म और प्रकृति. इन कारणों की विभिन्न दर्शनों में व्याख्या की गयी है. इन्हीं को षट्दर्शन कहा गया है. षट्दर्शन का उद्देश्य मनुष्य को दुखों से छुटकारा पाने का उपाय बताना, राग-द्वेष और अन्य विकारों से मुक्ति दिलाना, इस लोक और परलोक में सुख, अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करना और जीवन के विभिन्न पक्षों को समझाना है.

इन छह दर्शनों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

1.     वैशेषिक दर्शन

इस महत्वपूर्ण दर्शन का प्रवर्तन महर्षि कणाद ने किया था. इसका मुख्य विषय “परमाणुवाद” है. इसके अनुसार सभी वस्तुएँ विभिन्न परमाणुओं के संयोग से बनी हैं. हर परमाणु की अपनी विशेषताएँ होती हैं. इसीलिए इसे “वैशेषिक दर्शन” कहा गया है. इस ग्रंथ में दस अध्याय हैं. इसके सूत्रों की संख्या 369 है. “वैशेषिक दर्शन” के अनुसार धर्म उसे कहते हैं, जिससे इस लोक और परलोक में सुख प्राप्त होता हो. ईश्वर का वचन होने के कारण वेद प्रामाणिक हैं. संसार की सभी वस्तुएँ छह पदार्थों में विभक्त हैं- द्रव्य:, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय. ये द्रव्य नौ प्रकार के हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिक्,आत्मा और मन. इनमें पहले पाँच भौतिक हैं, जिनके गुणों में गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द शामिल हैं. पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु क्रमश: चार प्रकार के परमाणुओं से बने हैं. इनका विभाजन और नाश नहीं हो सकता. आकाश, दिक् और काल अप्रत्यक्ष द्रव्य हैं, जो नित्य और विभु हैं. मन नित्य है और मनुष्य को मन के द्वारा अपने आत्मा की अनुभूति होती है. आत्माएँ अनेक हैं, जो कर्मफल भोग के लिए भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती हैं. बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता. मोक्ष प्राप्त करना जीव का चरम लक्ष्य है.

 2.     न्याय दर्शन

“न्याय दर्शन” के प्रणेता महर्षि गौतम हैं. यहाँ न्याय शब्द का मतलब है-“ जिसके द्वारा किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्धि की जा सके. अर्थात जिसकी सहायता से किसी निश्चित सिद्धांत पर पंहुचना संभव हो”. इस दर्शन का प्रमुख विषय “प्रमाण” है. प्रमाण, प्रमेय आदि सोलह पदार्थों के तत्व ज्ञान से मुक्ति होती हैं. इसमें तर्क, प्रमाण, वाद आदि का व्यवस्थित विवेचन हैं. पांच अध्याय वाले इस ग्रंथ में 538 सूत्र हैं. इसके मुख्य चार विषयों में सामान्य ज्ञान की समस्या को हल करना, जगत कि पहेली को सुलझाना, जीवात्मा और मुक्ति तथा परमात्मा और उसका ज्ञान शामिल हैं.

“न्याय दर्शन” के अनुसार इस तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाता है, जिसके फलस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है. दुखों का पूरी तरह नाश हो जाता है. यह आस्तिक दर्शन है. ईश्वर जगत का नियंता है. अंत:करण की शुद्धि से ही मोक्ष मिल सकता है. मनुष्य को उसके कर्मों का फल देने वाली चैतन्य सत्ता होनी चाहिये.

“न्याय दर्शन” के अनुसार चार प्रमाण हैं- प्रत्यक्ष,अनुमान,शब्द और उपमान.

ईश्वर ने विश्व का निर्माण शून्य से नहीं बल्कि उपरोक्त छह उपादानों से किया है.

संसार का निर्माता कोई चेतन आत्मा है. वह सर्वशक्तिमान, सर्वग्य है. वह संसार की भौतिक व्यवस्था का संरक्षक है.  मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र है. अपने कर्मों के अनुसार ही वह सुख-दुःख का भागी होता है.  

 3.     सांख्य दर्शन- इस दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि हैं. इसे सबसे प्राचीन दर्शन माना जाता है. कपिल को भगवान् विष्णु का पाँचवां अवतार कहा जाता है. सांख्य दर्शन ज्ञान प्रधान है. इसमें “पुरुष” और “प्रकृति” की दो सत्ताएँ मानी गयी हैं. प्रकृति जड़ और पुरुष चैतन्य है. इन्हीं दो मूल तत्वों से सृष्टि की रचना होती है.  ये दोनों नित्य हैं. इस द्वेतवादी दर्शन में वेदों को प्रमाण माना गया है. इसका उद्देश्य जीवन को दुखों से मुक्त करना है, जिसका उपाय पुरुषार्थ बताया गया है. सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति तीन गुणों से युक्त है- सत्व, रज और तम. पुरुष तीनों गुणों से परे है. प्रलय के समय ये तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं. सृष्टि के चौबीस तत्व हैं-मूल प्रकृति, महत (बुद्धि), अहंकार, मन, पाँच तन्मात्राएँ(शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध), पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (नासिका, जिव्हा, चक्षु, त्वचा और कर्ण), पांच कर्मेन्द्रियाँ- वाक्, पाणी, वाद, गुदा और लिंग . पच्चीसवां तत्व पुरुष है, जो सृष्टा है.

4.     योग दर्शन- इसके प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं. इसके अनुसार मानव का वास्तविक स्वरूप उसका आत्मा है. यह एक चेतन तत्व है, लेकिन अज्ञानवश मानव ने अपने को जड़ शरीर मान लिया है. यही उसके दुखों का कारण है. इसकी निवृति सिर्फ आत्मज्ञान से संभव है. इसका साधन योग है. पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रयाहर, धारणा, ध्यान और समाधि. इस दर्शन में कुल 195 सूत्र और चार पाद हैं,जिनके नाम समाधिपाद, साध्नापद, विभुतिपाद और कैवल्यपाद हैं. योग एक अनुशासन है. चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है. यह अभ्यास और वैराग्य से प्राप्त किया जा सकता है. जो क्लेश, कर्म, कर्मों के फल और कर्मों के संस्कारों से रहित है, वह ईश्वर है. प्रणव ईश्वर का वाचक है. अविद्या, अस्मिता राग, द्वेष  और अभिनिवेश, ये पांच क्लेश हैं.

 5.     मीमांसा दर्शन- इस दर्शन के प्रणेता ऋषि जैमिनी हैं. इसमें कुल 12 अध्याय और 60 पाद हैं. इसके सूत्रों की संख्या 2 हज़ार 731 है. या आकार में सभी छह दर्शनों से बड़ा है. इस दर्शन का मुख्य विषय “धर्म” है. जीवन में सबसे पहली आवश्यकता धर्म है. धर्म से ही जीवन यात्रा सफल हो सकती है. धर्म का प्रमुख आधार “कर्म” है, जिसके बिना कुछ भी प्राप्त होना संभव नहीं है. इस दर्शन में ज्ञान प्राप्त करने के छह साधन बताये गये हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थोत्पत्ति और अनुपलब्धि. इसमें जगत और इसकी चीजों को यथार्थ माना गया है. शरीर नष्ट होने पर भी आत्मा का अस्तित्व रहता है, जो कर्मों के अनुसार  शरीर धारण करती है. जितने व्यक्ति हैं, उतनी आत्माएँ हैं. दुखों के पूरी तरह अभाव का नाम ही मुक्ति है. वेदों ने जैसा कहा है, वही हमारा धर्म है. वेदों में मांस भक्षण और पशुहिंसा का निषेध है.

 6.     वेदांत दर्शन- इसे उत्तर मीमांसा और ब्रह्मसूत्र भी कहा जाता है. भारत के आध्यात्मिक दर्शन का यह सिरमौर है. इसका प्रवर्तन महर्षि व्यास ने किया है. इसमें चार अध्याय, सोलह पाद और 556 सूत्र हैं. वेदों का अंतिम भाग होने से इसे “वेदांत” कहा जाता है. वेदों में तीन भाग हैं-ज्ञान, कर्म और उपासना. वेदांत इसका अंतिम भाग है, जिसका संग्रह उपनिषदों में किया गया है. इसके अनुसार परब्रह्म परमेश्वर सबको धारण करने वाला, सबसे बड़ा और सभी प्रवृत्तियों का स्वामी, और संचालक है. ब्रह्म ही सृष्टि का निमित्त और उपादान कारण है. सृष्टि उसकी कृति नहीं, अभिव्यक्ति है. ब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप है. जिस प्रकार बीज में पेड़ की पूरी सत्ता स्थित होती है, उसी प्रकार सृष्टि अप्रकट रूप से परब्रह्म में विद्यमान रहती है. परमात्मा कारण है और जीव उसका कार्य. जीव के सुख-दुःख का कारण उसके कार्य हैं. जीवात्मा नित्य है, जिसका नाश नहीं होता. जो व्यक्ति परब्रह्म को तत्व से नहीं जान लेता उसके लिए प्रतीकोपासना का विधान किया गया है. ब्रह्मविद्या का अधिकार सभी आश्रमों में है. ब्रह्म को मानने से नहीं जानने से ब्रह्मज्ञान होता है. 

 

 

धर्म जगत

SEE MORE...........