जब स्वप्न जगत की रचना नहीं हुई थी तब स्वप्न जगत की ये चार शक्तियां- जीव, माया, ब्रह्म तथा काल कहां पर थे?
इन चारों शक्तियों का मूल अलग-अलग है। स्वप्न जगत की रचना के पूर्व ये निराकार अवस्था में अपने अनादि रूप में स्वप्न की रचना करने वाले अक्षर पुरुष के अंदर कहां विश्राम करती थी क्योंकि आप अक्षर पुरुष को निराकार मानते हैं?
यदि आप इस स्वप्न जगत की रचना करने वाले अक्षर पुरुष को निराकार मानते हैं, तो आप अक्षर पुरुष, माया, ब्रह्म, जीव तथा काल को किस प्रकार अलग-अलग निरूपित करेंगे क्योंकि इन सबकी निराकार अवस्था ही होती है?
यदि आप पूर्णब्रह्म परमात्मा (नि:अक्षर) को भी निराकार ही मानते हैं तो अक्षर तथा नि:अक्षर (पूर्ण ब्रह्म परमात्मा) को कैसे अलग-अलग करके देखोगे?
यदि परमधाम से आने वाले सतगुरु का मूल स्वरूप भी निराकार है तो आप सतगुरु को पूर्णब्रह्म परमात्मा तथा अक्षर ब्रह्म से कैसे अलग करके देखेंगे?
यदि आप इस जगत को स्वप्न मानते हैं तथा स्वप्न की रचना करने वाले को निराकार मानते हैं, तो आप किस प्रकार सिद्ध करेंगे कि आकार विहीन स्वप्न के कर्ता का प्रतिबिंब हो सकता है क्योंकि स्वप्न तो जागृत अवस्था का प्रतिबिंब होता है?
पूर्णब्रह्म परमात्मा तो अकर्ता है तथा वह काल रहित तथा माया रहित है फिर इस स्वप्न जगत की रचना किसने की?
स्वप्न की रचना तो नींद में होती है तो आप किस प्रकार सिद्ध करेंगे की निराकार को नींद आ सकती है क्योंकि नींद तो स्थूल शरीर को ही आ सकती है?
यदि स्वप्न की रचना करने वाले को आप निराकार मानते हैं तो फिर यह स्वप्न उनके अंदर कहां बनता है क्योंकि असत्य स्वप्न तथा सत्य रचना करने वाला एक साथ नहीं रह सकता है?
स्वप्न की रचना नींद में होती है और नींद रचना करने वाले के चित्त में होती है। स्वप्न की रचना मन करता है। अतः आप यह बताने की कृपा करें कि निराकार का चित्त और उसका मन कहां होता है?
बजरंग लाल शर्मा
मानव धर्म, सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू है..!!
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