Published By:धर्म पुराण डेस्क

प्यार और प्रेम में क्या अंतर है? 

प्यार और प्रेम में क्या अंतर है? 

हम सब से कहा जाता है कि परमात्म प्रेम से जुड़ों, निस्वार्थ प्रेम से जुड़ों| कहते हैं प्रेम समस्याओं का जनक नहीं है, प्यार जरूर समस्याएं पैदा करता है, आप परमात्म प्रेम की बात करते हैं लेकिन यहां तो प्यार करना ही मुश्किल है और जिससे हम प्यार करते हैं उसके साथ अनेक तरह के कनफ्लिक्ट पैदा हो जाते हैं, कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो जाती हैं और उसके बाद “उसे” खोने का डर पैदा हो जाता है जिससे हम प्यार करते हैं|

हमें लगता है कि हम उससे दूर हो जाएंगे और अक्सर ऐसा होता है| दोनों एक दूसरे के प्रति आशंकित होते हैं| दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति शंका होती है| इसकी वजह से रिश्ता सहज नहीं हो पाता,असामान्य हो जाता है| उस रिश्ते को जीने की बजाए हम उसके कारण घुटने को मजबूर हो जाते हैं| यह एक की नहीं ज्यादातर लोगों की समस्या है|

यह समस्या दोस्ती में नहीं है, यह समस्या अन्य किसी रिश्ते में उतनी नहीं है जितनी कि लड़के और लड़की रिश्ते में| जिसे हम प्यार, लव कहते हैं उसमें जितनी समस्याएं हैं उतनी समस्याएं किसी और रिलेशन में नहीं हैं| और इसके पीछे की वजह भी आज हम डिस्कस करेंगे|

हमें किसी से प्यार होता है तो फिर क्यों उसी से तकरार होती है? उसी से झगड़ा उसी से तमाम तरह के विवाद और एक स्थिति ऐसी आती है कि जिससे हमें प्यार होता है, जिसके साथ हम जीने मरने की कसमें खाते हैं, उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहते हैं| यह लाइफ का एक बहुत ही अजीब सा पहलू है जिससे कई लोग दो-चार होते हैं| कई लोगों को अपनी लाइफ में कि इस प्यार के कारण ही काफी कड़वे अनुभव झेलने पड़ते हैं| 

वास्तव में प्यार को प्रोजेक्ट करने का श्रेय फिल्मों को जाता है, फिल्मी सोंग्स, वीडियो एल्बम ने प्यार को जबरदस्त तरीके से महिमामंडित किया है| यह बचपन से ही सीरियल्स, सोंग्स और फिल्मों के रूप में के रूप में धीरे-धीरे हमारे अंदर प्रवेश करने लगता है, आकर्षण प्यार कहलाने लगता है, उस प्यार में अनेक तरह की कि समस्याए छिपी हुई होती हैं,अल्टीमेटली वह समस्याएं सामने आ जाती हैं| लेकिन उन समस्याओं से कैसे मुकाबला किया जाए यह शायद ही फिल्मों, सीरियल या सोंग्स में बताया जाता है| 

जब हम कुचक्र में फंस जाते हैं तो फिर निकलते नहीं बनता और कई बार तो हमने देखा कि उस प्यार के कारण कितने ही लोग सुसाइड कर लेते हैं| ज्यादातर लोगों की जिंदगी में जवानी के दौर में कोई न कोई ऐसा मौका जरूर आता है जब वह प्यार में धोखे का शिकार हो जाता है| 

यह कैसा प्यार है जो कि जीवन का समाधान बनने की बजाय समस्या बन जाता है? क्यों हम किसी के प्रति पजेसिव हो जाते हैं? क्यों हम डरने लगते हैं? क्यों हमें लगता है कि वह हमें धोखा दे देगा और क्यों हमें लगता है कि यदि वह हमसे दूर चला जाए तो हम उसके बिना जी नहीं पाएंगे?

प्यार तो व्यापार भी नहीं है क्योंकि व्यापार में बराबरी का लेनदेन होता है| लेकिन यहां देने से ज्यादा लेने का भाव होता है| इसलिए प्यार व्यापार से भी निकृष्ट हो जाता है| व्यापार उत्कृष्ट अवस्था है जहां पर हम जितना देते हैं उतना ही प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, तो प्यार कहां खतरनाक हो जाता है? प्यार जब व्यापार भी नहीं रह जाता, प्यार में अब सामान्य लेनदेन का सिद्धांत भी कार्य नहीं करता और डिपॉजिट से ज्यादा विड्रॉल होने लगता है तो प्यार खतरनाक हो जाता है| 

यदि आप निस्वार्थ और पूर्ण प्रेम नहीं कर पा रहे हैं| तो अपने प्यार में कम से कम सामान्य व्यावहारिक सिद्धांत तो लागू करें| वह सिद्धांत जो लेने के बराबर देने में यकीन रखता है| लेन-देन के सिद्धांत पर यकीन रखता है| जितना हम लेंगे उतना हम देंगे| जितना हम देंगे उतना ही हम लेंगे| उससे ज्यादा लेने की हमारी अपेक्षा नहीं रहेगी| व्यापार बेईमानी के कारण निपट जाता है यह जो प्यार है वह भी लेनदेन में बेईमानी लालच के कारण निपट जाता है|

जब तक हम प्रेमपूर्ण ना हो जाएँ, जब तक हमारी स्थिति प्रेममयी ना हो जाए, जब तक हम परमात्मिक प्रेम से न जुड़ जाएं, तब तक कम से कम हम लेन-देन के सिद्धांत के अनुसार चलें| और इससे भी अच्छा होगा यदि हम लेन-देन के सिद्धांत से भी ऊपर उठ जाएं और हम सिर्फ देने के सिद्धांत पर चलें| 

हमें तो अपने प्यार में सिर्फ देना है हमें कुछ भी लेना नहीं है हमारी इच्छा सिर्फ देने की है या हम जितना लेंगे उसकी ज्यादा देंगे| हमारी अपेक्षाएं कम से कम होंगी, हम किसी को अपने अनुसार चलाने की कोशिश नहीं करेंगे| हम जिससे प्यार करते हैं वह हमारा गुलाम नहीं होगाऔर उसके हम अधिकारी नहीं होंगे| उसके हम मालिक नहीं होंगे|

यदि हम मूल्यांकन करेंगे तो हमें पता चलेगा कि हम सामने वाले का मालिक बनने का प्रयास कर रहे हैं| सामने वाले को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रहे हैं| उस व्यक्ति को रिमोट कंट्रोल की तरह ऑपरेट करने की हमारी कोशिश हमारे मूल्यांकन में साफ तौर पर नजर आ जाएगी| 

यदि आप किसी भी तरह के रिश्ते में है तो आप अपना मूल्यांकन करें और पता करें कि कहीं आप उस रिश्ते का रिमोट अपने हाथ में रखने की कोशिश तो नहीं कर रहे| यदि आप किसी रिश्ते को रिमोट से संचालित करने की कोशिश करेंगे तो वह रिश्ता निश्चित रूप से बोझिल हो जाएगा| भले ही सामने वाला व्यक्ति आपके ऊपर आश्रित है| वह आप के अनुसार चलने का दिखावा करेगा लेकिन वह आपका नहीं हो पाएगा| 

किसी भी व्यक्ति को ऑपरेट करने की कोशिश न करें| हां आपकी उपस्थिति के कारण, आप के प्रभाव के कारण, आपके प्यार की उत्कृष्टता के कारण यदि वह आपके अनुसार सहज रूप से चलता है कोई बुराई नहीं है| लेकिन जबरदस्ती चलाना नैसर्गिक सिद्धांत के खिलाफ है| किसी को भी जबरदस्ती अपने अनुसार चलाने की कोशिश न करें| किसी को भी जबरन अपना बनाने की कोशिश न करें| आपने देखा कि फिल्मों को देखकर कई लोग दीवाने हो जाते हैं| खास तौर पर लड़कों के साथ यह समस्या है| वह इतना ज्यादा पजेसिव हो जाते हैं कि उनके अंदर यह भाव पैदा हो जाता है कि वह सामने वाले व्यक्ति को प्यार कर रहे हैं| उस प्यार के जुनून में वह उस पर सवार होने की कोशिश करने लगते हैं|

पहले जो फिल्में आई उनके कारण लड़के कितने ज्यादा क्रेजी हो गए, किसी लड़की को देखा दिल दे बैठे, फिर हाथ काटने लगे, सुसाइड की धमकी देने लगे, एन केन प्रकारेण उस लड़की को अपना बना लिया| लेकिन नतीजा यह हुआ था कि वह रिश्ता ज्यादा नहीं चल पाया| ऐसे अनेक उदाहरण आपने भी देखे होंगे| इस तरह का एक तरफा प्यार जो बाद में दो तरफा प्यार में तब्दील हो गया एक समय बाद उसने दम तोड़ दिया था|

क्या पति-पत्नी के बीच में प्यार हो सकता है, निश्चित रूप से पति-पत्नी के बीच में प्यार हो सकता है, लेकिन दोनों को “प्रेम” की अवस्था तक पहुंचने में बहुत समय लगता है| प्यार तो हो सकता है प्यार सबके बीच में हो सकता है क्योंकि प्यार एक तरह का अटैचमेंट है, किसी भी व्यक्ति के साथ हम रहते हैं उसके साथ हम अटैच हो जाते हैं| जीव-जंतुओं के साथ अटैच हो जाते हैं तो फिर तो पति-पत्नी मनुष्य हैं| 

अटैचमेंट होगा लेकिन वह अटैचमेंट दुखदाई हो जाएगा, यदि उस अटैचमेंट के साथ पजेसिवनेस क्रेजीनेस या पूर्वाग्रह और दुराग्रह शक और शंकाएं जुड़ी रहेंगी| तो करना क्या? करना यह कि हम उस प्यार में थोड़ी सी स्वतंत्रता रखें, थोड़ा स्पेस रखें| उस व्यक्ति को अपना गुलाम बनाने की कोशिश ना करें, उस पर मालकियत का प्रयास न करें, उसे सहज रहने दें, जितना हो सके अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें, प्रेमपूर्ण रहें|

अब बात आती है कि कि पति-पत्नी के रिश्ते में यदि प्रेम नहीं है सिर्फ प्यार है तो इस तरह के रिश्ते का क्या मतलब?

देखिए इस दुनिया में जो भी रिश्ता है वह प्यार के इर्द-गिर्द ही घूमता है| प्रेम की किसी रिश्ते में कल्पना करना व्यर्थ है| क्योंकि प्रेम एक निस्वार्थ अवस्था है| उस अवस्था में किसी तरह की मालकियत,आग्रह दुराग्रह नहीं हो सकती| 

प्रेम हमेशा स्वतंत्रता का हिमायती है| प्रेम में किसी में आवश्यकता नहीं होती कि वह व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से हमारे सामने हो| वह हमारे प्रति समर्पित हो| वह हमारे साथ किसी रिश्ते में बंधे| इसकी अनिवार्यता प्रेम में नहीं होती| प्रेम तो वह अवस्था है जब सामने वाला व्यक्ति किसी और के साथ रिश्ते में बंध जाए तब भी हम प्रसन्नता का अनुभव करें| क्योंकि हम तो प्रेम करते हैं इसलिए उसकी खुशी में हमारी खुशी होगी| लेकिन वह अवस्था प्राप्त करना इतना आसान नहीं है| 

प्रेम की तरफ आगे बढ़ने का हमें लगातार प्रयास करते ही रहना है| लेकिन जिस रिश्ते में है हमें उस रिश्ते के बारे में भी समझना है| 

समाज कुछ सिद्धांतों पर आधारित है, समाज में कुछ नीतियां हैं, कुछ परंपराएं हैं, उनमें विवाह एक महत्वपूर्ण परंपरा है, यह परंपरा समाज में संतुलन स्थापित करने के लिए बनाई गई| पहले क्या होता था पहले जो शक्तिशाली लोग होते थे| राजा महाराजा जमीदार होते थे| वह एक साथ कई स्त्रियों से विवाह करते थे| शक्तिशाली पुरुषों के पास अनेक स्त्रियां होती थी और जो गरीब कमजोर व्यक्ति होता था उसका विवाह नहीं हो पाता था| इसलिए उस समय इस तरह की परंपराएं स्थापित की गई जिससे समाज में असंतुलन ना हो और बहुविवाह प्रथा को हतोत्साहित किया|

विश्व में एकल विवाह पद्धति की स्थापना की गई ताकि सबको बराबरी से जीवनसाथी मिल सके| जीवन को चलाने के लिए, उसे संतुलित रखने के लिए पति को पत्नी की, पत्नी को पति की आवश्यकता होती है| पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं| और वह सबसे श्रेष्ठ व्यापार है| क्योंकि इसमें बराबरी का भाव होता है| एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव होता है| जितना लेते हैं उतना देते हैं| इसमें हिसाब-किताब उस तरह से नहीं होता जिस तरह से दुकानों में होता है| इसमें बहुत सहज व्यवहार होता है और इस व्यापार में कोई बुराई नहीं|

इस तरह के कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं जहां पर एक प्रेमिका अपने प्रेमी को और अच्छे प्रेमी के लिए छोड़ देती हैं| ऐसे ही लड़के हैं एक लड़की से उनका अफेयर चलता है लेकिन इससे अच्छी लड़की मिल गई तो उस लड़की को छोड़ देते हैं|

सबसे पहले तो मनुष्य को “मनुष्य को” इस्तेमाल की वस्तु समझने की भूल नहीं करना चाहिए| क्योंकि इसके दुष्परिणाम हमें अपने जीवन में भोगने पड़ते हैं| यदि हम किसी को धोखा देते हैं किसी का इस्तेमाल करते हैं तो उसका नतीजा हमारे जीवन में हमें देखने को मिलेगा| दूसरी बात यदि हम किसी रिश्ते में है तो उसके प्रति पजेसिव आशंकित होने की जरूरत नहीं है| इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि वह व्यक्ति हमें छोड़ जाएगा| कौन जीवन भर साथ देता है| जीवन में पति-पत्नी में से भी एक को पहले जाना पड़ता है और दूसरे को अकेले रह जाना पड़ता है|

कोई तो पहले जाएगा| जो हमारे साथ है उसको एक दिन जाना ही है| जिसको छोड़ना है वह छोड़ ही देगा| जितनी जल्दी हमें उसकी सच्चाई पता चल जाए उतना ही अच्छा है| आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हम सबके आत्मिक सहयोगी होते हैं वह आत्मिक सहयोगी इस जीवन में अलग-अलग रूपों में हमारे सामने उपस्थित हो जाते हैं| जो हमारा आत्मिक सहयोगी होगा जीवन भर हमारे साथ रहेगा| उसकी उपस्थिति से हमें सहजता महसूस होगी| प्रेम महसूस होगा| हमें कॉन्फिडेंस आएगा| लेकिन जिस व्यक्ति के कारण आशंका-शंका पैदा होती है निश्चित रूप से वह हमारे आत्म ग्रुप का मेंबर नहीं है| एक ना एक दिन वह हमें छोड़ देगा|

कई बार हम अपने रिश्ते में चुनौतीपूर्ण स्थितियां खुद निर्मित करते हैं| अपने कर्म फलों को भोग के लिए, तो ऐसी स्थिति में कई लोग हमें कष्ट देते हैं हमें कचोटते हैं| हमें किसी ना किसी स्थिति में असहज करते हैं वह हमें धैर्यपूर्ण बनाने के लिए हमारे द्वारा चयनित व्यक्ति है जो जन्म से पहले हमने चयन किया था| जिससे हमने आग्रह किया था कि जीवन में हम धैर्य सीखें, जीवन में हम चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करें, ताकि हमारे कर्म फल कटे|

लेकिन इस व्यक्ति की खासियत यह होगी कि यह आपके साथ चुनौतीपूर्ण होगा कष्टपूर्ण होगा या आपको बार-बार नीचे गिराने की कोशिश कर सकता है, आपको डिमोरलाइज करने की कोशिश कर सकता है, आप का उपहास कर सकता है, आपको कचोट सकता है, आपको तमाम तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन यह व्यक्ति कभी भी आपका साथ नहीं छोड़ेगा| आप उसके साथ कनफ्लिक्ट में रहेंगे| आपके साथ उसके झगड़े रहेंगे मतभिन्नता ही रहेंगी फिर भी वह व्यक्ति आपके साथ रहेगा और यदि आपको ऐसा एहसास हो जाए कि  यह व्यक्ति लड़ाई झगड़ों के बावजूद भी हमारे साथ है तो आप समझ लीजिए कि आपके आत्मिक ग्रुप का मेंबर है और आपको उसके साथ रहने में किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए| वह जीवन भर आपके साथ रहेगा| थोड़ी-थोड़ी चुनौतीपूर्ण स्थितियां पैदा करते रहेगा ताकि आपके कर्म बंधन कटे| आपके अंदर निस्वार्थ प्रेम धैर्य करुणा, कृतज्ञता का विकास हो|

वास्तव में इस जीवन में हम कुछ सीखने के लिए आते हैं| कुछ लाइफ लेशंस होते हैं जो हमें सीखने होते हैं| लाइफ लेशंस हमें हमारे जॉब से, कैरियर से अन्यान्य परिस्थितियों से, हमें अलग-अलग तरह के जीवन के पाठ सीखने को मिलते हैं| रिश्ते भी हमें पाठ सिखाते हैं| रिश्ते भी हमें बताते हैं कि वास्तव में हम कितने स्वार्थपूर्ण हैं, हम कैसे निस्वार्थ बन सकते हैं? बिना पाए कैसे देख सकते हैं| कैसे हम परमात्म प्रेम से जुड़  सकते हैं| अपने रिश्तो से हमें बहुत कुछ मिल सकता है यदि हम उस रिश्ते की बारीकि में जाएँ| हम पता करें कि यह रिश्ता जो चुनौतीपूर्ण है, संघर्षपूर्ण है, यह रिश्ता हमें क्या सिखाना चाहता है?

कोई व्यक्ति हमें छोड़कर चला जाता है तो हमें धैर्य का विकास करना है शांति और संतोष का विकास करना है| हमें परमात्मा के प्रति तब भी और विश्वास रखना है| ठीक है वह व्यक्ति चला गया लेकिन उसके जाने के बावजूद भी मैं अकेला नहीं हूं| क्योंकि मेरे साथ तो तुम हो| परमात्मा से बड़ा सहयोगी कौन हो सकता है? तो वह रिश्ता जो टूट गया वह रिश्ता जिसमें हमारा साथी हमें छोड़कर चला गया वह रिश्ता हमें बहुत कुछ सिखा गया| वह अकेलापन हमें क्या बताना चाहता है? उस अकेलेपन के जरिए परमात्मा हमें कहा जोड़ना चाहता है? क्या उस अकेलेपन के माध्यम से आपको परमात्मा अपने आप से जोड़ना चाहता है? अध्यात्म से जोड़ना चाहता है? आपके मूल उद्देश्य से जोड़ना चाहता है?

यह बात भी आपको ध्यान में रखनी पड़ेगी| जो व्यक्ति भी अकेले हो चुके हैं, अपने जीवनसाथी के धोखे के शिकार होकर आज अकेले से जूझ रहे हैं वह सोचें कि आखिर वह अकेले क्यों हुए हैं? क्यों परमात्मा ने उन्हें अकेला किया है? क्या वह बहुत ज्यादा स्वार्थी हो गए थे? क्या वह रिश्ते के प्रति बहुत ज्यादा मालिकियत  का भाव रख रहे थे? क्या उस रिश्ते के कारण वह अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे थे? निश्चित रूप से कहीं ना कहीं आप अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे होंगे, उस रिश्ते के कारण आप अपनी जिंदगी में अटक रहे होंगे| इसलिए परमात्मा ने उस रिश्ते से आपको दूर कर दिया| ताकि आप अपना मूल्यांकन कर सकें| आप सोच सकें, समझ सकें कि आखिर यह जिंदगी यह जीवन आपको क्यों मिला है, और इस जीवन में आपको क्या करना है|


 

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