Published By:दिनेश मालवीय

कौन हैं यथार्थ ब्राम्हण?

जो ज्ञानवान है वही ब्राह्मण

समय के साथ, लम्बे समय से प्रचलित शब्दों को नये अर्थ और आयाम मिलते रहते हैं. हजारों साल पुराने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति में अनेक ऐसे शब्द हैं, जिन्हें लेकर आज बहस छिड़ी है. 

मज़े की बात तो यह है कि शब्दों के अर्थ देश, काल और परिस्थिति के सन्दर्भ में न समझकर आज के सन्दर्भ में उन्हें लागू करने गलती हो रही है. किसी समय किसी शब्द का कुछ अर्थ होता है तो किसी अन्य समय में उसका अलग अर्थ होता है. हमारे देश में आज ‘ब्राह्मण’ शब्द को लेकर बहुत व्यापक बहस चल रही है. उन्हें बहुत गालियाँ दी जा रही हैं, उनपर आक्षेप लगाए जा रहे हैं और उन्हें भारतीय समाज के विघटन का कारण तक बताया जा रहा है.

आइये “ब्राह्मण” को लेकर अतीत, वर्तमान, शास्त्रों और महापुरुषों के कथन के सन्दर्भ में कुछ विचार कर लिया जाए.

समाज में धारणाएं बनती और बिगड़ती रहती हैं. कुछ धारणाओं का आधार होता है, कुछ निराधार होती हैं और कुछ का थोड़ा बहुत आधार होता है. हमारे समाज में एक धारणा बहुत प्रचलित है, जिसे बहुत दृढ़ता से आग्रहपूर्वक प्रतिपादित किया जाता है. वह यह है कि शिक्षा से जाति और वर्ण संबंधी विसंगतियों तथा पूर्वाग्रहों का अंत हो जाता है. कुछ हद तक यह सही हो सकता है, लेकिन अधिकतर पढ़े-लिखे या पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोगों से मिलकर ऐसा नहीं लगा. कई बार तो ऐसा लगता है कि शिक्षित होने के बाद उनके पूर्वाग्रह और मजबूत हो गये हैं.

किसी से भी कुछ देर बातें कीजिए, वह किसी न किसी तरह घुमा फिराकर आपकी जाति जानना चाहता है. आपमें हज़ार सद्गुण हों, लेकिन अगर आप किसी कथित ऊँची जाति में नहीं जन्में हों, तो इसका पता चलते ही सामने वाला आपको पचास प्रतिशत डिसकाउन्ट कर देता है. यह बात कम होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है. कुछ लोग तो कुछ भी ब्राहृणोचित गुण और आचरण न होने के बाद भी अपने ब्राहृण कुल में जन्म लेने को इतना महिमामंडित करते हैं कि कोफ्त होने लगती है.

दूसरी तरफ ब्राहृणों को भला-बुरा कहने वालों की भी कमी नहीं है. इस विषय पर मैंने बहुत समय तक चिन्तन और अध्ययन किया और जो समझ में आया उसे यहाँ अभिव्यक्त कर रहा हूँ.

भारतीय शास्त्रों में ब्राहृण की महिमा बहुत गायी गयी है. कोई भी शास्त्र उठा लीजिए, ब्राहृणों का यशोगान अवश्य मिलेगा. उनका वध करना निषेध है, उनका अपमान करने से कुल का नाश हो जाता है, ब्रहम्हत्या से बड़ा पाप नहीं है, ब्राहृण नरों में श्रेष्ठ है, ब्राहृण पृथ्वी का स्वामी है, ब्राहृण पूज्य है, ब्राहृण परम पवित्र है, कुपित ब्राहृण संपूर्ण राष्ट्र का विनाश कर देता है, आदि आदि बातों से शास्त्र भरे पड़े हैं.

सोचता हूँ कि भारत की मनीषा ने यदि ब्राहृण की इतनी महिमा गायी है, तो अवश्य ही वह कोई बहुत असाधारण व्यक्तित्व होगा. वर्षों तक चिन्तन करने पर मैंने पाया कि भारत की संस्कृति में जो भी गर्व करने योग्य है और भारत को जिन श्रेष्ठताओं के कारण विश्व में सम्मान मिला है, वह ब्राहृणों की ही देन है.

भारत के ब्राहृण की प्राचीन काल में क्या प्रतीष्ठा थी, इसका अंदाजा एक घटना से ही लग जाता है. प्लेटो के दर्शन की नयी व्याख्या करने वाला प्लेटिनस ईरानी साम्राज्य पर होने वाले आक्रमण में सिर्फ आशा से शामिल हुआ था कि शायद कोई ब्राहृण मिल जाए.

मेरी इस बात का यह गलत अर्थ निकाला जा सकता है कि मैं ब्राहृणवादी हूँ. दरअसल मैं कोई वादी नहीं हूँ और न किसी वाद में विश्वास करता हूँ. मैं तो उपरोक्त बातों की तह में जाकर सही संदर्भ और सही परिप्रेक्ष्य में विषय को समझने का प्रयास भर कर रहा हूँ.

मेरे चिन्तन में मूल प्रश्न यह उठता है कि जिस ब्राहृण का प्रशस्तिगान शास्त्रों में हुआ है, वह ब्राहृण है कौन? इस विषय में दो धारणाएँ प्रचलित हैं. पहली यह कि जो ब्राहृण परिवार में जन्म ले, वह ब्राहृण है. दूसरी यह कि चाहे किसी ने किसी भी कुल में जन्म लिया हो, यदि वह अपनी साधना, अनुशासन और परिश्रम से कतिपय गुण अर्जित कर ले तो वह ब्राहृण हो जाता है. एक तीसरी धारणा भी है, कि जो स्वयं को शरीर जाने, वह शूद्र और जो अपने चैतन्य स्वरूप को जाने वह ब्राहृण है, चाहे उसने जन्म किसी भी कुल में लिया हो. भारतीय ग्रन्थों में कहा गया है कि जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं, संस्कारों से द्विज को श्रेष्ठता प्राप्त होती है.

यहाँ जन्म के बजाय संस्कारों को वरीयता दी गयी है।

महाभारत में युधिष्ठिर-सर्प संवाद का उल्लेख भी इस विषय को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।

सर्प ने युधिष्ठिर से पूछा कि "ब्राहृण कौन है''?

युधिष्ठिर ने कहा कि "ब्राहृण वह है, जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव, तपस्या और दया, इन सद्गुणों का निवास हो.''

सर्प ने कहा कि "ये गुण तो शूद्र में भी हो सकते हैं.'' युधिष्ठिर ने कहा कि "यदि शूद्र में उपर्युक्त लक्षण हैं और ब्राहृण में नहीं हैं, तो वह शूद्र, शूद्र ही नहीं है और न वह ब्राम्हण, ब्राहृण है. जिस शूद्र में ये गुण मौजूद हों, वह ब्राहृण माना गया है, और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए.''

इससे यह बात तो स्पष्ट हो गयी कि जिसे शास्त्रों में ब्राहृण कहा गया है, उसका ब्राहृण कुल में जन्म लेने से बहुत ज्यादा संबंध नहीं है. असली प्रश्न गुणों  औेर संस्कारों का है. ब्राहृण कुल में जन्म लेने वाला हर ब्राहृण सद्गुणी हो न हो, लेकिन हर सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति अवश्य ब्राहृण है. इस बात की संभावना अधिक मानी गयी है कि संस्कारित ब्राहृण परिवार की संतान भी संस्कारित होंगी. लेकिन यह तो सभी वर्णों पर लागू होता है.

अब प्रश्न उठता है कि क्या किसी अ-ब्राहृण कुल में जन्मा व्यक्ति ब्राहृण बन सकता है? इसके बारे में शास्त्रों में उदाहरणों की कमी नहीं है. ऐसे अनेक लोग हुए, जिन्होंने ब्राहृण कुल में जन्म नहीं लिया, लेकिन अपने जीवन में सद्गुणों का विकास कर वे ब्राहृण की कोटि में आ गये. छान्दोग्य उपनिषद में कथा है कि रैक्व ने जनश्रुति को वेद की शिक्षा दी किन्तु रैक्व गाड़ीवान, अत: शूद्र थे। ऋग्वेद के दशम मंडल के अनेक मंत्रों के रचयिता ऐलुष, शूद्र थे. महर्षि विश्वामित्र के संरक्षक वेदकालीन राजा सुदास शूद्र थे. सुदास का राज्याभिषेक ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने किया था. कृष्ण-द्वैपायन व्यास की माता सत्यवती धीवर जाति की थी. जाबाला को तो यह भी पता नहीं था कि उसका पुत्र सत्यकाम किस पुरुष के संसर्ग से जन्मा था. सत्यकाम ब्राम्ह विद्या का अधिकारी माना गया और जाबाली ऋषि बना. वेदों के आरंभिक काल में सभी श्रेणियों के लोग ऊपर उठकर ब्राहृणत्व प्राप्त कर लेते थे.

इतना ही नहीं, मेरी समझ से तो शिक्षा-ज्ञान अर्जन में लगे हर व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त था और उसे ब्राहृण ही माना जाता था. ब्राह्मण की मूल अवधारणा यही प्रतीत होती है. जैसा कि आज के दौर में वैज्ञानिकों, लेखकों, शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों को उच्च स्थान प्राप्त है. प्राचीन काल में, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जीवन खपाने वाले कणाद, बोधायन, भृगु, वशिष्ठ, भारद्वाज, अत्रि, गर्ग, शौनक, शुक्र, चक्रायण, घुंडीनाथ, नंदीश, काश्यप, अगस्त्य, परशुराम, द्रोण, दीर्घतमस, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य आदि सभी ब्राहृण माने जाते थे, जबकि इन सभी ने ब्राहृण कुल में जन्म लिया था. दरअसल ब्राहृण जाति नहीं स्वभाव या प्रवृत्ति है.

आज ब्राहृण शब्द को लेकर बहुत तीखी तकरार की स्थिति बन रही है. ब्राहृणों पर तोहमतें लगाकर उन्हें निकृष्ट और अन्य वर्गों के दमनकर्ता के रूप में पेश किये जाने की कोशिशें भी चल रही हैं. समाज में अनेक बुराइयों तथा विभाजनों के लिए ब्राहृणों को ही दोषी ठहराया जा रहा है. सही संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह बात बेबुनियाद है.हाँ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कालांतर में ब्राहृण वर्ण के कुछ लोलुप और दुर्गणी लोगों ने कतिपय ऐसे कार्य अवश्य किये, जो किसी भी तरह ब्राहृण स्वाभाव और कर्म के विरुद्ध थे, लेकिन इसके लिए सभी ब्राहृणों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सच्चे ब्राम्हणों, जिनकी संख्या कम नहीं रही, ने सभी जाति-वर्णों के साथ यथायोग्य सामन्जस्य और समरसता स्थापित कर समाज को सही दिशा दी.

दरअसल, वर्ण-व्यवस्था के मूल स्वरूप को न समझने से ही आज यह बखेड़ा हो रहा है. यह कहना बड़ी नासमझी की बात है कि किसी समय व्यक्तियों की कर्मगत विशिष्टताओं को देखते हुए उन्हें ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चार वर्णों में विभाजित कर दिया गया. यह विभाजन किसी व्यक्ति या व्यक्तियों का किया हुआ नहीं है. ये मनुष्य स्वाभाव के चार प्रकार हैं.

किसी व्यक्ति को पठन-पाठन, ज्ञानार्जन, ज्ञान-ध्यान में स्वाभाविक रुचि होती है. कोई कितना भी उसे डिगाने का प्रयास करे, कितनी भी बाधाएँ उसके मार्ग में आयें और उसे चाहे जितने भी कष्ट उठाने पड़ें, वह अपने मार्ग से विचलित नहीं होता. उसे जीवन में ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं लगता.ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति को ब्राहृण कहा गया.

जिस व्यक्ति में सत्ता, शक्ति, यश और भौतिक सम्पन्नता प्राप्त करने की सहज प्रवृत्ति है, जो किसी पर अन्याय होते देख मूक दर्शक नहीं बना रह सकता, अन्याय नहीं सह सकता और जिसे अपने जीवन से ज्यादा अपना और अपने देश का स्वाभिमान प्यारा है, ऐसे स्वभाव वाला व्यक्ति क्षत्रिय कहा जाता है.

जिस व्यक्ति का पुरुषार्थ अर्थ या धन में बसता है, जिसके जीवन का मकसद ही पैसा कमाना हो, कृषि और व्यापार जिसे सहज प्रिय हों, कुल मिलाकर जिसकी वणिक बुद्धि हो, ऐसी प्रवृत्ति के व्यक्ति को वैश्य कहा गया.

जो व्यक्ति दूसरों की सेवा में सुख मानता है, जिसमें उपरोक्त तीनों कार्य करने की क्षमता या प्रवृत्ति नहीं है और जिसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं हो, जो आलस्य और प्रमाद में डूबा रहता हो, सहज ही शोक करता हो, ऐसी प्रवृत्ति के व्यक्ति को शूद्र कहा गया.

इन चारों तरह के स्वभाव वाले व्यक्ति सारे विश्व में और हर समाज में मिलते हैं. इस विभाजन को भारत में वर्ण व्यवस्था का नाम दिया गया.

ईरानी समाज में चार जातियाँ थीं. यूनान के दार्शनिक प्लेटो ने मनुष्य की चार जातियों का उल्लेख किया है. इसी तरह, पश्चिमी समाज में भी पादरी, व्यापारी, सैनिक और दास जैसे विभाजन मिलते हैं.

भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था का मौलिक स्वरूप ऊँच-नीच वाला नहीं था. यह सिर्फ स्वभावगत वर्गीकरण है, जिसमें कोई ऊँचा या नीचा नहीं था. बहरहाल, कालांतर में इस व्यवस्था में पुरोहिताद विकसित होने पर विकृतियां आती चली गयीं. व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण उसके स्वभाव या कर्म के बजाय उसके कुल और जन्म से होने लगा. यहीं से वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप विकृत होता चला गया. आज नौबत यह आ गयी है कि वर्ण-व्यवस्था को समाप्त करने की माँग दिनों-दिन बलवती होती जा रही है. अपने वर्तमान विकृत स्वरूप में इसका धीरे-धीरे समाप्त हो जाना तय है, लेकिन मनुष्य के चार प्रकार के स्वभावों के चलते किसी और नाम से वर्गीकरण हो जाएगा.

मैं फिर अपने मूल विषय पर आता हूँ कि क्या ब्राहृण कुल में जन्म लेने भर से कोई ब्राहृण हो जाता है? और क्या किसी अ-ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर कोई व्यक्ति ब्राहृण नहीं हो सकता?

इसमें भी शास्त्र और इतिहास ही प्रमाण है। जैनों के सभी चौबीस तीर्थंकर क्षत्रिय थे. भगवान बुद्वध और विश्वामित्र क्षत्रिय थे. वाल्मीकि जन्म से शूद्र थे. मध्य युग में देखें तो अपनी तपस्या और साधना से संत कोटि को प्राप्त करने वाले अधिकतर संत ब्राहृण कुल में नहीं जन्में थे, लेकिन उनकी श्रेष्ठता को ब्राहृणों ने भी स्वीकार किया. आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महर्षि महेश योगी कायस्थ कुल में जन्में, लेकिन उन्होंने उच्चकोटि का ब्राहृणत्व प्राप्त किया.ब्राह्मणत्व अर्जित किया जाता है, यह विरासत में नहीं मिलता.

हाल के पूज्य लोगों में यादव कुल में जन्में बाबा रामदेव ने अपने योग कौशल से जो शक्तियाँ अर्जित की हैं, उनके फलस्वरूप लाखों ब्राहृण भी उनके शिष्य हैं. जयप्रकाश नारायण कायस्थ थे, अन्ना हजारे माली हैं, महात्मा गाँधी वैश्य थे, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मुस्लिम थे. क्या ये किसी ब्राहृण से कम हैं?

क्या जुलाहे संत कबीर महान नहीं थे? वह कहते थे कि "हम वासी उस देश के जहाँ जाति, धर्म, कुल नाहिं''. मीरा राजघराने की रानी थीं, लेकिन उन्होंने शूद्र रैदास से गुरुदीक्षा ली थी. अब्दुल रहीम खानखाना और रसखान दो ऐसे मुसलमान कवि थे जिन्होंने कृष्ण-भक्ति को अपनाया.भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने कहा है कि "इन मुसलमान कविजनन पर कोटि हिन्दु वारिये''

लेकिन इन बातों की गहराई में न जाकर आज भी बड़ी संख्या में लोग पुराणपंथी बने हुये हैं. ब्राहृण निश्चय ही पूज्य, श्रद्धेय और सम्मानित है, लेकिन प्रश्न वही आता है कि ब्राहृण कौन?

भगवान बुद्ध ने धम्मपद के ब्राम्हणवग्गो में ब्राहृण के लक्षण बताते हुए कहा कि जो ध्यानी, निर्मल, आसनबद्ध, कृतकृत्य, आश्रवरहित है, जिसने निर्वाण को पा लिया है, उसे मैं ब्राहृण कहता हूँ. जिसने पाप धोकर बहा दिया है, वह ब्राहृण है.

बुद्ध ने कहा कि मैं माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण किसी को मैं ब्राहृण नहीं कहता हूँ, मैं ब्राहृण उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही और त्यागी है.

"जो चर-अचर प्राणियों में प्रहार-विरत हो, जो न किसी को मारता है, और न मारने की प्रेरणा देता है, उसे मैं ब्राहृण कहता हूँ।''

"जो विरोधियों के बीच विरोधरहित है, जो दंडधारियों के बीच दंडरहित है, संग्रह करने वालों के बीच जो संग्रह-रहित है, उसे मैं ब्राहृण कहता हूँ।''

"न जटा से, गोत्र से और न जन्म से ब्राहृण होता है, जिसमें सत्य और धर्म है, वही पवित्र है और वही ब्राहृण है।''

इसी तरह अनेक तरह से बुद्ध ने ब्राहृण को इसी रूप में परिभाषित किया हैं.

बुद्ध भी ब्राहृण का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि "ब्राहृण पर प्रहार नहीं करना चाहिए. ब्राहृण को जो मारता है, उसे धिक्कार है''. यानी ज्ञानवान व्यक्ति का वध नहीं करना चाहिए. उनका तात्पर्य जन्म से ब्राह्मण से नहीं है.

अब ज़रा यह देखते हैं कि भारतीय संस्कति और ज्ञान परम्परा के प्रतिष्ठित ज्ञानी महात्मा विदुर पंडित या ब्राहृण के विषय में क्या कहते हैं :-

""क्रोध, हर्ष, घमंड, लज्जा, उद्यतता, अपने को मान्य समझने की भावना, ये भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते, वही, व्यक्ति पंडित कहलाता है''

"जिसकी सांसारिक बुद्धि धर्म और अर्थ का ही अनुवर्तन करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है, वहीं पंडित कहलाता है.

"जिसकी वाणी नहीं रुकती, जो विचित्र ढंग से बात-चीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभा सम्पन्न हैतथा जो ग्रंथ के तात्पर्य को शीघ्र बता सकता है, वह पंडित कहलाता है.

इन सब बातों में व्यक्ति के ब्राहृण कुल में जन्म लेने का कहीं उल्लेख नहीं है।

रामधारी सिंह दिनकर "संस्कृति के चार अध्याय'' में लिखते हैं कि निश्चय ही ब्राहृण के शील, स्वभाव और चरित्र की अवधारणा जिस ऊँचे धरातल पर हुयी है, उसके अनुसार उसे सर्वोच्च स्थान दिया जाना सर्वथा उचित ही है. वह समाज का पतन नहीं होने देता था. उसे समाज में विवेक का  प्रतिरूप माना जाता था. उसमें इतना नैतिक बल होता था कि वह राजा को भी गलत कार्य करने पर टोंक देता था और उसे दृढ़तापूर्व सही मार्ग दिखाता था.''

बहरहाल, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि शास्त्रों ने ब्राहृण को एकतरफा उच्च स्थान दिये जाने की वकालत की हो. जो ब्राहृण ब्राहम्णोचित आचरण नहीं करता उसके मामले में शास्त्र उतना ही कठोर भी है.

महाभारत के वन पर्व में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में युधिष्ठिर कहते हैं कि "चारों वेद पढ़ा होने पर भी जो दुराचारी है, वह अधमता में शूद्र से भी बढ़ कर है।''

महाभारत में ही ऋषि मार्कण्डेय कहते हैं कि "पतित ब्राहृण तथा चोर को दिया हुआ दान भी व्यर्थ होता है.'' महाभारत में अन्य अनेक ऐसे दृष्टांत और प्रसंग आते हैं, जिनमें ब्राहृण के आचरण को जन्म पर वरीयता दी गयी है.

इस सारे संदर्भ को सामने रखकर अगर समाज के जागरूक लोग इस देश में ब्राहृणत्व को जगा सकें, तो यह देश अपने मूल स्वरूप, संस्कारों, और जीवन मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए विश्व में सिरमौर बन सकेगा. इसके विपरीत दिशा में जाने पर आपसी टकराव और बिखराव के सिवा कुछ हाथ नहीं लगने वाला. जिसे हम ब्राहृणत्व कह रहे हैं उसे जैन धर्म में "जिनत्व' और बौद्ध धर्म में "बुद्धत्व'' कहा गया है. इसे जगाना इस युग की सबसे बड़ी और तत्काल आवश्यकता है.

 

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