Published By:अतुल विनोद

वेद को आदि-अनंत क्यों कहा जाता है? विज्ञान के युग में क्या ये अंधविश्वास नहीं है?.... अतुल विनोद 

वेद को आदि अनंत क्यों कहा जाता है? विज्ञान के युग में क्या ये अंधविश्वास नहीं है? अतुल विनोद

Why is Veda called Adi Anant? Isn't this superstition in the age of science?  Atul Vinod

अब लोग सोचेंगे कि वेद कैंसे आदि(source,infinity) किताब हो सकते हैं? 

बिलकुल सही है कोई भी किताब स्रष्टि की शुरुआत में नहीं प्रकट हो सकती खासकर तब जब भाषाएँ ही न बनी हों| 

लेकिन यही मनुष्य की बुद्धि तर्क वितर्क कुतर्क में फस जाती है| 

वेद किताब नहीं बल्कि अध्यात्मिक सत्य के कोष हैं| 

स्वामी विवेकानंद के मुताबिक “वेद भिन्न भिन्न काल में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा अविष्कृत धार्मिक सत्य का संचित संग्रह हैं”

सत्य आदि भी होता है और अनंत भी मौजूद वैदिक किताबें सत्य रुपी वेद का वर्णन है वेड अनंत है इसलिए इन किताबों में भी उसे पूरी तरह समाहित नहीं किया जा सकता|

शब्द की सीमा है शब्द वेद को कागज़ पर नहीं उतार सकते लेकिन फिर भी ऋषियों ने प्रयास किया है| जैसे किसी स्थान पर जाना और उसका वृत्तान्त लिखना अलग है उसी तरह वेद का अंतरतम में प्रकट होकर उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति और उसे लिखने में अंतर आ जाता है| हर उच्च स्तरीय मानव में वेद साक्षात्कार के रूप में प्रकट होते हैं फिर वो उन्हें लिखने का प्रयास करता है|

सत्य ही आदि और अनंत है| अध्यात्मिक सत्य यानि दुनिया के वो नियम जो खोजे जाने से पहले भी मौजूद थे| 

जैसे गुरुत्वाकर्षण बल हमे पता लगने से पहले से मौजूद था, वैसे ही वैदिक ज्ञान की कोडिंग लिपिबद्ध होने से पहले मानव की चेतना में है | भाषा के अविष्कार से पहले भी ज्ञान था| 

गृह नक्षत्रों की कोई भाषा नहीं फिर भी वो संतुलित, समन्वित, अनुशासित और नियमों के अनुसार ही बंधे हुए और गतिशील है| 

गणित के आविष्कार से पहले भी गणित मौजूद था, तभी तो प्रथ्वी अपनी धुरी के एक चक्कर में २४ घंटे ही लगाती है| 

प्रकृति के मूलभूत नियम कभी नहीं बदलते जैसे बीज को अनुकूल परिस्थिति मिले तो उसे अंकुरित होना ही है| जैसे पानी को १०० डिग्री तक गर्म करो तो उसे भाप में बदलना ही है| 

जैसे सूर्य की रौशनी सत्य है वैसे ही वेद सत्य है| लिखे गये वेद में मूल ज्ञान मौजूद है उसकी व्याख्या में हेरफेर हो सकती है क्यूँकि लिपिबद्ध करने और उन्हें भाषाई शब्दों में पिरोने वाले मानव होते हैं वे तात्कालिक मान्यताओं के अनुसार उस ज्ञान को लिखते हैं| 

जैसे वैदिक ज्ञान यदि ५०० साल पहले किसी ने शब्द और भाषा में पिरोया तो वो उसमे किसी व्याख्या में बैलगाड़ी का ही प्रयोग करेगा प्लेन का नहीं क्यूंकि उस वक्त प्लेन नहीं था| 

मूलभूत दैवीय स्रष्टि ज्ञान तकनीक के विकास के साथ नहीं बदलता बस उदाहरण बदल सकते हैं| 

जैसे उर्जा का बाहरी स्वरुप बदलता है लेकिन मूल में वो घटती या बढती नहीं| वैसे ही ज्ञान का स्वरूप बदल सकता है लेकिन मूलभूत सूत्र स्थाई रहते हैं| 

वेद भारत की विश्व को दी गयी अनूठी देन हैं| इन पर किसी एक जाति का आधिकार नहीं है| 

वेद शब्द का अर्थ सत्ता, ज्ञान और प्राप्ति(विदधते, वेत्ति और विदंते) भी है|

सत्ता सत है, ज्ञान चित्त और प्राप्ति आनंद| 

वेद सत्य, चेतना और आनंद के सूत्र हैं| 

सच्चिदानंद ही वेद है और ये ही ब्रह्म है| 

इस स्रष्टि की उत्पप्ति सच्चिदानंद से हुयी इसीलिए वेद को ही दुनिया की  उत्पत्ति का आधार बताया गया| 

वेद वाक्य हैं लेकिन वे तत्व भी हैं| साइंस कहता है उर्जा पदार्थ में और पदार्थ ऊर्जा में बदल सकता है| “E = mc2” 

वेद में कहा गया कि चेतना का वाक(पदार्थ) में और वाक का चेतना में परिवर्तन हो सकता है|

यही तो वो सूत्र है जिसे आइन्स्टीन ने बाद में प्रतिपादित किया जिससे परमाणु उर्जा का उपयोग शुरू हुआ| 

आइन्स्टीन का सूत्र भौतिक पदार्थ ही बना सकता है| लेकिन वेद का सूत्र शब्द रुपी नाद,  स्पन्द, चित्त, प्राण, और आत्म तत्व तक जाता है जिनसे प्राणी का निर्माण होता है|

विज्ञान पदार्थ और उर्जा तक सीमित है जबकी वेद का विस्तार चेतना और चैतन्य तक है| विज्ञान इस गॉड पार्टिकल तक पहुचने का प्रयास कर रहा है| 

विज्ञान कहता है उर्जा पदार्थ में और पदार्थ उर्जा में बदलता है| वेद कहते हैं चित्त प्राण में और प्राण पदार्थ में बदलता है| यहाँ चित्त चेतन है, प्राण उर्जा है और वाक् पदार्थ है| मन, चित्त और प्राण मिलकर चेतना बनती है|

there is a possibility that Vedas have a better formula than the one given by Einstein

"Stephen Hawking"

इन सब बातों को विज्ञान को समझने में समय लगेगा| जो कल अंधविश्वास नजर आता था आज नही| जैसे मानव के उड़ने की बातें कभी अन्धविश्वास थी आज एक गुब्बारे के सहारे वो उड़ लेता है| मानव के समुद्र के तल में पहुचने की बात मज़ाक लगती है लेकिन छोटे से उपकरण के साथ वो ऐसा कर लेता है|  कभी रामायण में वर्णित पुष्पक विमान भी कपोल कल्पना कहा जाता था लेकिन अब ये सामान्य है| पहले लोक लोकान्तरों की बातें भी इमेजिनेशन कही जाती थी आज कितने ही ग्रहों पर जीवन के अस्तित्व का पता लगता जा रहा है| 

 

 

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